निकाय चुनाव : लविवि में आयोग का कार्यालय बनाने की तैयारी, हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
आयोग नगरीय निकायों में अन्य पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व के संदर्भ में जांच व अध्ययन करते हुए संस्तुति के साथ राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपेगा। आयोग का कार्यालय लखनऊ विश्वविद्यालय स्थित क्षेत्रीय नगर एवं पर्यावरण अध्ययन केंद्र (आरसीयूईएस) में बनाने पर विचार किया जा रहा है।
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नगर निकाय चुनाव के मद्देनजर पिछड़ों को आरक्षण देने के लिए गठित आयोग के क्षेत्राधिकार का निर्धारण कर दिया गया है। इसके लिए सरकार की ओर से स्थिति स्पष्ट कर दी गई है। जिसके मुताबिक आयोग नगरीय निकायों में अन्य पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व के संदर्भ में जांच व अध्ययन करते हुए संस्तुति के साथ राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपेगा। आयोग का कार्यालय लखनऊ विश्वविद्यालय स्थित क्षेत्रीय नगर एवं पर्यावरण अध्ययन केंद्र (आरसीयूईएस) में बनाने पर विचार किया जा रहा है। इसके लिए नगर विकास विभाग के अधिकारियों ने बृहस्पतिवार को आरसीयूईएस परिसर का जायजा भी लिया है।
आयोग उपलब्ध रिकार्डों, रिपोर्टों, सर्वे और अन्य उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर कुल जनसंख्या में पिछड़े वर्ग के नागरिकों की जनसंख्या के शहरी निकायवार अनुपात और उनके पिछड़ेपन के क्रम में अध्ययन करते हुए अनुशंसा के साथ रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा। इसके अलावा आयोग केंद्र और राज्य सरकार के कार्यालयों व जनता से ऐसी जानकारी या आंकड़े प्राप्त करने के लिए संगठनों, संस्थानों या व्यक्तियों से जरूरत के आधार पर सहायता ले सकेगा।
ओबीसी आरक्षण को लेकर जनवरी के पहले हफ्ते में सुनवाई संभव
ओबीसी आरक्षण के बिना स्थानीय निकाय चुनाव कराने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को प्रदेश सरकार ने बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल कर हाईकोर्ट के आदेश पर रोक की मांग की है।
सरकार ने तर्क दिया है कि निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण निर्धारण के लिए उसने उप्र. राज्य स्थानीय निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन कर दिया है। आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ओबीसी आरक्षण के साथ चुनाव कराने की मंजूरी देने का आग्रह किया गया है। शीर्ष अदालत जनवरी के पहले हफ्ते में इस पर सुनवाई कर सकती है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 27 दिसंबर को ओबीसी आरक्षण के बगैर तत्काल निकाय चुनाव कराने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने स्थानीय निकाय चुनाव के लिए सरकार के 5 दिसंबर को जारी मसौदा अधिसूचना को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट का वह फैसला उस याचिका पर आया था जिसमें सुप्रीम कोर्ट से निर्धारित ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले का पालन किए बिना ओबीसी आरक्षण के मसौदे को तैयार करने को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट के फैसले के बाद ओबीसी के लिए आरक्षित सभी सीटें अब सामान्य मानी जाएंगी।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले के मुताबिक राज्य को एक आयोग बनाना होगा जो अन्य ओबीसी की स्थिति पर अपनी रिपोर्ट देगा। इसके आधार पर आरक्षण लागू होगा। ट्रिपल टेस्ट में यह देखा जाता है कि राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग की आर्थिक-शैक्षणिक स्थिति क्या है? उनको आरक्षण देने की जरूरत है या नहीं? उनको आरक्षण दिया जा सकता है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में कहा था कि ओबीसी आरक्षण के लिए तय शर्तों को पूरा किए बिना आरक्षण नहीं मिल सकता है। इसी ट्रिपल टेस्ट के कारण मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार आदि राज्यों में भी निकाय चुनाव में पेंच फंसा था।