कभी कांग्रेस का तो कभी भाजपा का रुख क्यों कर रहे हैं मुलायम सिंह?
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संसद में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव का यू टर्न यूं ही नहीं है। कांग्रेस से दूरियां और भाजपा से उनकी नजदीकियां सियासी मजबूरी है,नए ध्रुवीकरण का संकेत या उनका नया पैंतरा,राजनीतिक पंडित इसका आकलन कर रहे हैं।
सपा मुखिया ने पहली बार अचानक रुख नहीं बदला है। वह यूपीए-1 सरकार में परमाणु करार पर वामपंथी दलों और यूपीए-2 में सियासी गठजोड़ पर तृणमूल कांग्रेस को इसी तरह झटका दे चुके हैं।
संसद के मानसून सत्र में सोमवार को मुलायम सिंह यादव के दांव से कांग्रेस ही अलग-थलग नहीं पड़ी,विपक्षी एकता भी टूट गई। मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुलायम की जमकर तारीफ की।
सपा मुखिया के इस बदले हुए रुख पर कुछ लोग हैरान हैं, तो कुछ इसे उनके राजनीतिक कौशल का हिस्सा मानते हैं। कुछ लोग राजनीति में नया ध्रुवीकरण भी देखने लगे हैं। हालांकि ऐसे लोगों की तादाद कम है।
अब केंद्र सरकार से संबंध सुधारना चाहते हैं मुलायम
दरअसल,मुलायम पहले भी कई मुद्दों पर अपना रुख बदलते रहे हैं। वह हालात को भांपकर फैसला करते हैं। माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में हाल में कई मोर्चों पर घिरी सपा सरकार के हित में वह केंद्र सरकार से टकराव के बजाय सौहार्दपूर्ण संबंध चाहते हैं।
राजभवन से विधान परिषद सदस्यों की सूची व लोकायुक्त की नियुक्ति पर लाल झंडी से सपा सरकार परेशान है। ऐसे में सपा मुखिया नहीं चाहते कि राजभवन के साथ ही केंद्र सरकार से तल्खी का कोई संदेश जाए।
राजनीतिक समीक्षक उनके यू टर्न को यूपी के समीकरणों को साधने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं।
जनता के दबाव में बदला रुख :वाजपेयी
संसद में मुलायम के नरम रुख से प्रदेश में भाजपा और सपा एक-दूसरे के प्रति नरमी बरतने नहीं जा रहे हैं। सपा नेताओं का कहना है कि संसद में लगातार हंगामे के चलते सपा प्रमुख ने गतिरोध दूर कराने में मदद की।
इसे भाजपा की मदद के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसका प्रदेश की सियासत से भी कोई संबंध नहीं है। उधर,प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ.लक्ष्मीकांत वाजपेयी कहते हैं कि संसद या विधानमंडल में एक सीमा तक हंगामा बर्दाश्त होता है उसके बाद जनता जवाब मांगने लगती है।
सांसद से अपेक्षा रहती है कि वे क्षेत्र के मुद्दे उठाएं। मुलायम वरिष्ठ राजनीतिज्ञ हैं, निसंदेह उनका लंबे संघर्षों का इतिहास है,वह समझ गए कि कांग्रेस के पास कुछ नहीं है। क्षेत्र के लोगों और जनता की ताकत के दबाव में उन्होंने रुख बदला। हम उनके या सपा के प्रति कोई नरमी नहीं बरतने जा रहे हैं। हम उनसे भी किसी नरमी की उम्मीद नहीं रखते।
भाजपा के पास नहीं गए वक्त को परखा :द्विवेदी
लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ.एसके द्विवेदी कहते हैं कि भले ही प्रदेश की सत्ता से जुड़े कुछ निहित स्वार्थ हों लेकिन मुलायम सिंह यादव का फैसला वक्त और माहौल को परखकर लिया गया है।
मुलायम की दृष्टि इस समय 2017 के विधानसभा चुनाव पर है। संसद में कांग्रेस और विपक्षी दलों के रवैये को अब जनता,खासतौर पर शिक्षित वर्ग पसंद नहीं कर रहा है। उनके गले यह तर्क नहीं उतर रहा है कि भाजपा ने भी तो संसद नहीं चलने दी थी।
चोर का उदाहरण देने से चोरी तो खत्म नहीं हो जाती। मुलायम सिंह को अब लगा कि वे कांग्रेस के साथ रहेंगे तो जनमत उनके विपरीत जा सकता है। इसलिए अपना रुख बदल लिया।वह भाजपा के पास नहीं गए बल्कि 2017 में जनता को जवाब देने के लिए वक्त व माहौल को परखा है।