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मोदी के क्षेत्र में मेट्रो चलाना सबसे मुश्किल: ई. श्रीधरन

Tue, 17 Nov 2015 11:07 AM IST
Updated Tue, 17 Nov 2015 11:07 AM IST
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metro project in varanasi will be a challenge

मेट्रोमैन डॉ. ई. श्रीधरन पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में मेट्रो ट्रेन चलवाने को सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं। उनका कहना है, बनारस में संकरे इलाके होने से ज्यादातर रूट अंडरग्राउंड बनाने होंगे। पर, वहां जमीन मिलने में बहुत परेशानियां होने की आशंका है।

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श्रीधरन ने यह भी कहा, मैं केवल लखनऊ मेट्रो के लिए नहीं, पूरे प्रदेश में प्रस्तावित मेट्रो परियोजनाओं के लिए सरकार का सलाहकार हूं। इसलिए बाकी सभी मेट्रो परियोजनाओं को लेकर भी मैं राज्य सरकार को सलाह दूंगा।
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डॉ. ई. श्रीधरन सोमवार को यहां पत्रकारों से बातचीत में कहा कि सभी शहरों में मेट्रो निर्माण चुनौतीपूर्ण होता है। लखनऊ में भी है। मगर वाराणसी में ये काम सबसे अधिक मुश्किल होगा। वहां बहुत संकरे और भीड़ भरे इलाके हैं।
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ऐसे में वहां एलिवेटेड मेट्रो की संभावना कम है, जबकि अंडरग्राउंड निर्माण के लिए ज्यादा जमीन की जरूरत होगी। इसे हासिल करने में भी दिक्कत आएगी। इसके अलावा राजधानी से दूर होने की वजह से कागजी कार्यवाही में भी समय लगेगा।

मगर एक बार काम शुरू होने की दशा में काम आगे बढ़ेगा। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने लखनऊ के अलावाकानपुर, मेरठ, वाराणसी और आगरा में भी मेट्रो परियोजना को लेकर प्रस्ताव बनाया है। इसमें कानपुर की विस्तृतपरियोजना रिपोर्ट तो सरकार के सामने प्रस्तुत की जा चुकी है।

मेट्रो के लिए अलग केंद्रीय एजेंसी की जरूरत नहीं

metro project in varanasi will be a challenge

श्रीधरन ने देश भर में चलने वाले सभी मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी को लेकर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, अलग से ऐसी किसी भी केंद्रीय एजेंसी की जरूरत नहीं है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय बेहतर काम कर रहा है।

देश भर में 12 मेट्रो परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं, जबकि आधा दर्जन संचालित हैं। इनमें से किसी का लाभ ज्यादा है तो किसी का कम। ऐसे में एक ही एजेंसी के तहत संचालन से कई दिक्कतें सामने आएंगी। इसके अलावा राज्य और केंद्र के बीच को-ऑर्डिनेशन भी नहीं बनाया जा सकेगा।

कम कर्मचारी रखें, सरकार मदद करे तो कम होगी लागत

मेट्रो परियोजनाओं की लागत कम करने को लेकर डॉ. श्रीधरन की राय है कि परियोजनाओं में केवल उतने ही लोगों को नौकरी दी जाए, जितनों की जरूरत है। नौकरी देने में ही करीब 33 फीसदी का खर्च हो जाता है।

इसको कम किया जाए। सरकार विभिन्न स्तर पर सहायता कर के भी परियोजना की लागत को कम कर सकती है। इसमें बिजली कंपनियां मेट्रो परियोजना को नो-प्रॉफिट, नो-लॉस पर बिजली दें। सरकारी जमीन और अन्य सरकारी सुविधाओं में भी मेट्रो कॉर्पोरेशन को रियायत दी जाए।

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