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कोरोना के बाद बढ़ेंगी मानसिक बीमारियां!, ऑनलाइन सर्वे में चौंकाने वाला खुलासा, जारी की गाइडलाइन
Sat, 18 Apr 2020 10:32 AM IST
शाहरुख खान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: शाहरुख खान
Updated Sat, 18 Apr 2020 10:32 AM IST
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फाइल फोटो
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कोरोना के बाद मानसिक बीमारियों का खतरा बढ़ेगा। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का दुष्परिणाम दिखेगा। हालांकि दुष्परिणाम नजर आने में वक्त लगेगा। सार्स और उसके बाद 2012 के मिडिल ईस्ट रिस्पिरेटरी सिंड्रोम (मर्स) के चपेट में जो देश आए थे उनमें इसके दुष्परिणाम सालभर बाद दिखे थे। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में मानसिक चिकित्सा के पैटर्न को भी बदलना पड़ सकता है। इसे ध्यान में रखते हुए केजीएमयू ने ऑनलाइन सर्वे शुरू कर दिया है।
समस्या को सवालों के माध्यम से आसानी से समझें
क्यों बढ़ेंगी मानसिक बीमारियां
केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. आदर्श त्रिपाठी इस सवाल पर कहते हैं कि महामारी की स्थिति में लोगों को अनिश्चितता महसूस होती रहती है। अकेलापन इन बातों को और बढ़ा देता है। यही विचार और भावनाएं एंग्जायटी डिसऑर्डर में बदलने लगती हैं। जिन देशों में सॉर्स की बीमारी आई थी, वहां के सर्वे बताते हैं कि सात फीसदी में एंग्जायटी और 17 फीसदी में गुस्से के लक्षण देखे गए।
लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग कैसे बढ़ाएगा समस्या को
कोरोना के दौर में सोशल डिस्टेंसिंग बढ़ी है। लॉकडाउन से मेल-जोल भी कम हो गया। ऐसे में अवसाद, चिड़चिड़ापन बढ़ेगा।
इलाज के पैटर्न में क्यों बदलाव जरूरी
मनोचिकित्सक डॉ. शाश्वत सक्सेना इस सवाल पर कहते हैं कि जिन लोगों को अवसाद, चिड़चिड़ापन, घबराहट सहित अन्य तरह की समस्याएं होती हैं, उन्हें एकांतवास छोड़ने, सोसायटी के बीच ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताने की सलाह दी जाती है। पर, लंबे समय तक सोशल डिस्टेंसिंग से मानसिक रोगियों के इलाज के पैटर्न को बदलना पड़ सकता है। इसी वजह से मनोरोग एसोसिएशन ने भी अपने सदस्यों को हर मरीज का डाटा रखने का आह्वान किया है। डब्ल्यूएचओ ने भी लोगों को मानसिक रोग से बचने के लिए गाइडलाइन जारी कर दी है।
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समस्या को सवालों के माध्यम से आसानी से समझें
क्यों बढ़ेंगी मानसिक बीमारियां
केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. आदर्श त्रिपाठी इस सवाल पर कहते हैं कि महामारी की स्थिति में लोगों को अनिश्चितता महसूस होती रहती है। अकेलापन इन बातों को और बढ़ा देता है। यही विचार और भावनाएं एंग्जायटी डिसऑर्डर में बदलने लगती हैं। जिन देशों में सॉर्स की बीमारी आई थी, वहां के सर्वे बताते हैं कि सात फीसदी में एंग्जायटी और 17 फीसदी में गुस्से के लक्षण देखे गए।
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लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग कैसे बढ़ाएगा समस्या को
कोरोना के दौर में सोशल डिस्टेंसिंग बढ़ी है। लॉकडाउन से मेल-जोल भी कम हो गया। ऐसे में अवसाद, चिड़चिड़ापन बढ़ेगा।
इलाज के पैटर्न में क्यों बदलाव जरूरी
मनोचिकित्सक डॉ. शाश्वत सक्सेना इस सवाल पर कहते हैं कि जिन लोगों को अवसाद, चिड़चिड़ापन, घबराहट सहित अन्य तरह की समस्याएं होती हैं, उन्हें एकांतवास छोड़ने, सोसायटी के बीच ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताने की सलाह दी जाती है। पर, लंबे समय तक सोशल डिस्टेंसिंग से मानसिक रोगियों के इलाज के पैटर्न को बदलना पड़ सकता है। इसी वजह से मनोरोग एसोसिएशन ने भी अपने सदस्यों को हर मरीज का डाटा रखने का आह्वान किया है। डब्ल्यूएचओ ने भी लोगों को मानसिक रोग से बचने के लिए गाइडलाइन जारी कर दी है।
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ऑनलाइन सर्वे शुरू, हर पहलू पर होगा अध्ययन
डॉ. आदर्श त्रिपाठी कहते हैं कि भविष्य के खतरे को देखते हुए अभी ऑनलाइन सर्वे शुरू किया गया है। पीजी के छात्रों को कोरोना इफेक्ट पर शोध कार्य ज्यादा से ज्यादा देने की तैयारी है। ऑनलाइन सर्वे में लोगों से उनकी दिनचर्या, तनाव बढ़ने, कोरोना का डर, भविष्य की चिंताओं से जुड़े सवाल पूछे जाएंगे। इन सवालों के जवाब के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा।
पर इससे बचें कैसे
सकारात्मक सोचें। नेचुरल म्यूजिक जैसे झरने की आवाज, चिड़ियों का चहचहाना सुनें।
समय पर उठें और समय पर खाना खाएं। हरी सब्जियां, दाल, फल, दूध, दही पर्याप्त मात्रा में लें।
शारीरिक श्रम अवसाद को कम करता है और नींद के लिए बेहतर होता है। इसलिए कसरत करें। छत पर टहलें।
अध्ययन बताते हैं
कोरोना से बढ़ता है चिड़चिड़ापन
चीन के लोगों पर हुए एक अध्ययन में बताया गया कि वहां लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी लोग अपने बगल से किसी के गुजरने पर चौंक जाते हैं। क्वारंटीन रहने वालों में 73 फीसदी में उदासी और 57 फीसदी में चिड़चिड़ापन की समस्या पाई गई। क्वारंटीन की वजह से बच्चों में चार गुना अधिक तनाव पाया गया।
डॉ. आदर्श त्रिपाठी कहते हैं कि भविष्य के खतरे को देखते हुए अभी ऑनलाइन सर्वे शुरू किया गया है। पीजी के छात्रों को कोरोना इफेक्ट पर शोध कार्य ज्यादा से ज्यादा देने की तैयारी है। ऑनलाइन सर्वे में लोगों से उनकी दिनचर्या, तनाव बढ़ने, कोरोना का डर, भविष्य की चिंताओं से जुड़े सवाल पूछे जाएंगे। इन सवालों के जवाब के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा।
पर इससे बचें कैसे
सकारात्मक सोचें। नेचुरल म्यूजिक जैसे झरने की आवाज, चिड़ियों का चहचहाना सुनें।
समय पर उठें और समय पर खाना खाएं। हरी सब्जियां, दाल, फल, दूध, दही पर्याप्त मात्रा में लें।
शारीरिक श्रम अवसाद को कम करता है और नींद के लिए बेहतर होता है। इसलिए कसरत करें। छत पर टहलें।
अध्ययन बताते हैं
कोरोना से बढ़ता है चिड़चिड़ापन
चीन के लोगों पर हुए एक अध्ययन में बताया गया कि वहां लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी लोग अपने बगल से किसी के गुजरने पर चौंक जाते हैं। क्वारंटीन रहने वालों में 73 फीसदी में उदासी और 57 फीसदी में चिड़चिड़ापन की समस्या पाई गई। क्वारंटीन की वजह से बच्चों में चार गुना अधिक तनाव पाया गया।
सार्स के तीन साल बाद तक दिखा असर
अध्ययन में सार्स फैलने के दौरान हुई समस्याओं का भी जिक्र किया गया है। कहा गया है कि बीमारी खत्म होने के बाद करीब 26 फीसदी लोग नियमित तौर पर भीड़भाड़ वाले इलाके में जाना छोड़ दिया था और 21 फीसदी ने पूरी तरह से सार्वजनिक जगह पर जाना छोड़ दिया था। सार्स के चलते अस्पताल कर्मचारियों पर क्वारंटीन के तनाव का असर तीन साल बाद तक देखा गया था।
अध्ययन में सार्स फैलने के दौरान हुई समस्याओं का भी जिक्र किया गया है। कहा गया है कि बीमारी खत्म होने के बाद करीब 26 फीसदी लोग नियमित तौर पर भीड़भाड़ वाले इलाके में जाना छोड़ दिया था और 21 फीसदी ने पूरी तरह से सार्वजनिक जगह पर जाना छोड़ दिया था। सार्स के चलते अस्पताल कर्मचारियों पर क्वारंटीन के तनाव का असर तीन साल बाद तक देखा गया था।