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एमबीबीएस छात्रों ने बहुत मिस किया कैम्पस, कहा-घर पर वो माहौल कहां

Thu, 15 Jul 2021 02:15 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Thu, 15 Jul 2021 02:15 AM IST
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mbbs students missd campus in corona pandamic time
लखनऊ। नीट की परीक्षा पास करने के बाद केजीएमयू जैसा कैंपस मिल गया, और क्या चाहिए था। एक सपना पूरा हुआ और एडमिशन लेकर परिसर में प्रवेश किया। अभी आपसी परिचय ही हो पाया था, ठीक से एक दूसरे को जानना बाकी था कि अचानक कोरोना की दूसरी लहर ने आकार सबको अलग-अलग कर दिया। केजीएमयू में एमबीबीएस फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट्स खुद को ठगा सा महसूस करने लगे। अपने-अपने घर को लौटना पड़ा। इस दौरान इन्हें दोस्त, दोस्ती व कैंपस से दूरी बहुत खली। अमर उजाला ने एमबीबीएस के कुछ स्टूडेंट्स से बात की और जाना क्या कुछ उन्होंने इस दौरान मिस किया। एक रिपोर्ट...।
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डिसेक्शन हॉल में नहीं मिल पाया प्रवेश : तनुश्री सिंह
हां, हम सब की आंखों में सपना था कि हम केजीएमयू में पढ़ें। मेरे मम्मी-पापा दोनों डॉक्टर हैं। पहले भी यहां आती रही हूं, लेकिन स्टूडेंट के रूप में यहां आने के बाद एक गर्व महसूस होता है। फरवरी में प्रवेश के बाद परिचय का सिलसिला शुरू हुआ ही था कि कोरोना आ गया। सब अपने-अपने घर। इस दौरान सबसे ज्यादा हमने डिसेक्शन हॉल को मिस किया, जहां हमें कैडेवर को छूकर मानव अंगों की पहचान, कार्यप्रणाली व इलाज के तरीकों को समझाया जाता। हर स्टूडेंट इस रोमांच को महसूस करना चाहता है, लेकिन हमें वह मौका नहीं मिल पाया। इसी तरह ह्यूमन लैब, ह्यूमेटोलाजी लैब के बारे में वर्चुअली जानने का मौका मिला, पर असली रोमांच तो जमीनी हकीकत को समझने में है।
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व्हाट्सएप ग्रुप तक सीमित हो गए हम : अभिनव
गोरखपुर से पहली बार लखनऊ आया, वह भी इतने बड़े संस्थान में। लगा कि सब मिल गया, सपनों को पंख लग गए। सहयोगियों से मिलना शुरू हुआ, परिचय-दोस्ती हो गई। लेकिन अचानक से लॉकडाउन लग गया और लखनऊ को जानने-समझने की उम्मीद धरी रह गई। हम वापस गोरखपुर पहुंच गए। इस बीच बस एक बात अच्छी रही कि साथियों से परिचय हो गया था, व्हाट्सएप ग्रुप बन गए थे। इसके कारण बातचीत चलती रही, विषयों पर चर्चा होती रही और पढ़ाई नहीं रुकी। आनलाइन पढ़ाई शुरू होने तक कुछ-कुछ कॉन्सेप्ट क्लीयर हो गया था।
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हमने तो मार्च में घूमने का प्लान बना लिया था
खुद को वाराणसी और लखनऊ दोनों जगह के निवासी बताने वाले अमन देव यादव कहते हैं कि दोस्तों को भला कौन मिस नहीं करता है, हमने भी किया। कैडेवर तक पहुंच ही नहीं पाए लॉकडाउन के कारण। हम दोस्तों ने तो मार्च में घूमने का प्लान बना लिया था। इस दौरान बस एक चीज अच्छी रही कि हमने व्हाट्स ग्रुप व ऑनलाइन के जरिये ग्रुप स्टडी की। हर कोई टॉपिक बांट लेता था, एक-एक कर सभी पढ़ते और पढ़ाते थे।
कैद होकर रह गए हम लोग
रायबरेली के रहने वाले दीप वर्मा कहते हैं कि सोचा तो बहुत कुछ था, लेकिन कोरोना ने आकर सब सोच ही बदल दी। लखनऊ का कोना-कोना, मेडिकल कॉलेज का कोना-कोना देखना चाहते थे, पर कुछ भी नहीं हो सका। पहले घर पर रहे, पूरा घर संक्रमित हो गया था। जब लौट कर हॉस्टल आए तो यहां से बाहर ही नहीं निकल सके। कोई भी होगा परेशान हो जाएगा, हम लोग तो यहां इस माहौल में एकदम नए थे। ये कैद परेशान करने वाली थी।
नॉर्मल कॉलेज लाइफ जी ही नहीं सके
बिजनौर निवासी रग्धा मतीन कहती हैं कि नीट की तैयारी करते-करते घूमना-फिरना, दोस्त सब छूट गए थे। सोचा था कि एक बार एडमिशन हो जाए फिर नॉर्मल कॉलेज लाइफ जिएंगे। पर कोरोना आ जाने से सामान्य जीवन हम जी ही नहीं सके। पढ़ाई भी प्रभावित हुई। पहला साल अनुभव मांगता है, पर हमारे पास तो वो भी नहीं था। कई बार हमारा आत्मविश्वास डगमगाया। प्रैक्टिकल नॉलेज मिलने में बाधा पहुंची। अब हम लोग ज्यादा से ज्यादा पढ़ाई की कोशिश कर रहे हैं।

कैंपस, कॉलेज का माहौल घर में कहां
वाराणसी निवासी श्रेया माहेश्वरी कहती हैं कि कैंपस और कॉलेज का माहौल घर में तो नहीं मिल सका। जहां आप पढ़ाई कर रहे होते हैं वहां से आपकी एक बॉन्डिंग बन जाती है। यहां बॉन्डिंग ही आपको आगे बढ़ने और पढ़ने की प्रेरणा देती है। इस रिश्ते को हमने काफी मिस किया।
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