घरेलू झगड़े में फंसी सपा के खिलाफ मायावती ने अपनाया ये 'मास्टर प्लान'
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सूबे में सपा की सरकार है, लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती के हमले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ज्यादा तीखे होते रहे हैं। चुनाव जब अखिलेश सरकार के राजकाज का होना है, वह मोदी के ढाई साल के कामकाज का ज्यादा ताकत से हिसाब मांगती आ रही थीं।
लग रहा था कि मायावती सूबे की सपा सरकार के खिलाफ नहीं, केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ चुनाव लड़ने जा रही हैं। पर, बदले सियासी माहौल में बसपा के इस रुख में बदलाव नजर आने लगा है।
जब से सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के परिवार में सियासी कलह तेज हुई है और गठबंधन के जरिए सपा अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश में दिख रही है, न सिर्फ अखिलेश सरकार पर मायावती का हमला तेज हुआ है, बल्कि उनके वित्तीय कामकाज की जांच का एलान भी उन्होंने किया है।
गुंडों, माफिया और दबंगों को वह पहले से ही सत्ता में आने पर जेल भेजने का खम ठोकती आई हैं। इधर मायावती के खास सिपहसालारों के हमले भी अखिलेश सरकार पर बढ़ गए हैं।
मोदी पर ही रही हैं ज्यादा हमलावर
सत्ता से हटने के बाद मायावती बहुत खास और गिने-चुने मौकों पर ही लोगों के सामने आईं। पब्लिक मीटिंग रही हो या मीडिया से मुलाकात, जब केंद्र में यूपीए सरकार थी तब मायावती ने उसे निशाने पर रखा और जब से भाजपा सरकार आई है मायावती के निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हो गए।
कुछ दिन पहले संपन्न चार क्षेत्रीय जनसभाओं व राजधानी की एक बड़ी सभा में मायावती अखिलेश से ज्यादा मोदी पर हमलावर नजर आईं। जिन मुख्यमंत्री अखिलेश की कुर्सी पाने के लिए मायावती सारे समीकरण बिठाने में लगी हैं, उनका नाम लेकर शायद ही कभी उन्होंने आलोचना की हो। पर, मायावती इधर बदले रणनीति के साथ नजर आ रही हैं।
बसपा सुप्रीमो खुद मुख्यमंत्री का नाम तो अब भी नहीं ले रही हैं लेकिन भाजपा के साथ मुख्यमंत्री के हर काम पर अब उनकी प्रतिक्रिया आने लगी है। सपा में जैसे-जैसे दूसरे दलों से गठबंधन की सुगबुगाहट बढ़ रही है, मायावती उन पर हमले तेज कर उनके प्रशासन, कामकाज और विकास को बेदम, दिखावा और उन्हें कमजोर साबित करने में जुट गई हैं।
आर्थिक मामलों पर ही नहीं, विकास पर भी उठाए सवाल
वह बजट में व्यवस्था और चुनाव की घोषणा से पहले स्कूली बच्चों को थाली देने पर सवाल उठा रही हैं तो यह जानकर भी कि चुनाव के पहले की गई घोषणा के आधार पर कोई जांच नहीं हो सकती, वह प्रधानों के मानदेय बढ़ाने जैसे अखिलेश सरकार के आर्थिक फैसलों की जांच का एलान कर रही हैं।
वह यह साबित करना चाहती हैं कि सरकार पैसे का अपव्यय कर रही है और सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में पड़ी हुई है। उन्होंने डेंगू से हो रही मौतों पर हाईकोर्ट के रुख के बाद सरकार को घेरने में देरी नहीं की।
मुख्यमंत्री अखिलेश लखनऊ मेट्रो व आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे को अपनी सरकार के विकास का चेहरा बता रहे हैं, तो वह यह लगातार लोगों को याद दिलाने की कोशिश में लगी हैं, इन कामों की रूपरेखा तो उन्होंने ही बनाई थी, बस ये वाहवाही लूटने का प्रयास कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री अखिलेश ने बसपा और भाजपा को दो-दो बार मिलकर सरकार बनाने की याद दिलाई तो मायावती ने मुसलमानों में इसका गलत संदेश जाता देखकर यह याद दिलाने में ज्यादा वक्त नहीं लिया कि राम मंदिर पर पहला फावड़ा चलाने वाले साक्षी महराज को राज्यसभा में सपा ने ही भेजा था। साथ ही अयोध्या में विवादित ढांचे को ढहवाने वाले कल्याण सिंह को सपा में शामिल करने में उनकी पार्टी ने कोई हिचक नहीं दिखाई थी।
सपा को घेरने पर ही बन रही है बसपा की संभावना
विश्लेषक बताते हैं कि विधानसभा चुनाव की प्रकृति होती है कि जो सूबे की सत्ता में होता है, उसकी नाकामियों पर हमले मतदाताओं को भाते हैं। भाजपा इसी वजह से बसपा पर कम, सपा पर तीखा हमला कर रही है। मायावती को शायद यह बात समझ में आ गई होगी।
दूसरा, मायावती का भाजपा पर तो पहले जैसा ही हमला जारी रहेगा, वजह सबसे ज्यादा नुकसान उसी ने पहुंचाया है। लेकिन बदली रणनीति की एक वजह सपा की कलह से बेचैन मुस्लिम मतदाता और सपा का संभावित गठबंधन भी नजर आ रहा है।
बसपा नेतृत्व सोच रहा होगा कि अखिलेश सरकार को वह जितना ज्यादा कमजोर बता पाएंगी, मुस्लिम मतदाता उनकी ओर उतना ही आकृष्ट होगा। वह सपा सरकार के खिलाफ जितने तीखे तेवर दिखाएंगी, उनके मतदाता में उतना ही ज्यादा उत्साह होगा।
इसके अलावा, सपा का कांग्रेस, रालोद व जदयू से यदि गठबंधन भी हो जाता है तो सपा की यही कमजोर छवि ही बसपा की बेहतर उम्मीद बना सकती है। संभवत: इसी वजह से मायावती, उनके राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी व सतीश चंद्र मिश्र ने अखिलेश सरकार पर चौतरफा हमले बोलना शुरू कर दिया है।
मायावती अखिलेश सरकार की कानून-व्यवस्था और कामकाज पर सवाल उठा रही हैं तो नसीमुद्दीन सपा घोषणापत्र में मुसलमानों से किए वादों को पूरा न करने की पूरी तैयारी से याद दिला रहे हैं।
सपा पर तेज हुए बसपा के सियासी शूरमाओं के सियासी तीर
चुनावी लाभ लेने वाले फैसलों की जरूर जांच कराऊंगी
बसपा सुप्रीमो मायावती ने शुक्रवार को जारी किए गए बयान में कहा था कि विधानसभा का आमचुनाव नजदीक है और सपा सरकार के मुखिया समाज के विभिन्न वर्गों को लुभाने के लिए किस्म-किस्म की घोषणाएं कर रहे है।
ग्राम प्रधानों का 1000 रुपये मानदेय बढ़ाना और मध्याह्न भोजन के अंतर्गत स्कूली बच्चों को सपा सरकार की प्रचार सामग्री के तौर पर खाने का बर्तन देना सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का प्रयास है। चुनाव में अपनी कुर्सी जाते हुए देखकर मुख्यमंत्री आए दिन जो भी बड़े-बड़े आर्थिक फैसले कर रहे हैं, बसपा सत्ता में आने पर इसकी जरूर जांच कराएगी।
लूट के बंटवारे के लिए चल रहा फेमिली ड्रामा
वहीं, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा का कहना है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके चाचा व पिता के बीच चल रहा फेमिली ड्रामा केवल लूट के धन के बंटवारे के लिए चल रहा है। ...अखिलेश के घर वालों ने उनसे सारा काम छीन लिया है, अब वह सिर्फ फोटो खिंचवाने का काम कर रहे हैं।
झूठा है घोषणापत्र के वादे पूरे करने का दावा
बसपा के राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपने घर पर प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि सपा पर हमला करते हुए कहा- सपा ने अपने 2012 के घोषणापत्र में मुसलमानों से यह वादा किया था कि वे उनकी आबादी के अनुसार यूपी में सपा की सरकार बनने के बाद आरक्षण देंगे और जेलों में बंद बेकुसूर मुसलमानों को रिहा किया जाएगा। ये वादे पूरी तरह झूठे व खोखले साबित हुए हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश बताएं, ये वादे पूरे किए।