NRHM घोटाला: मायावती से आठ घंटे पूछताछ, जानें मामला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
यूपी में 5700 करोड़ रुपये से ज्यादा के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) घोटाले में सीबीआई ने पूर्व मुख्यमंत्री मायावती से आठ घंटे तक पूछताछ के बाद अब फिर चर्चा होने लगी है कि क्या घोटाले का सच सामने आएगा। सीबीआई इस मामले में अब तक 76 से अधिक केस दर्ज कर चुकी है। 48 आरोपियों पर चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है।
इस घोटाले में कुछ नए साक्ष्य हाथ लगने के बाद सीबीआई ने बसपा सुप्रीमो मायावती से उनके दिल्ली स्थित आवास पर 28 सितंबर को पूछताछ की। हालांकि मायावती इस केस में आरोपी नहीं हैं।
इसके बाजवूद मायावती से उनके कार्यकाल में स्वास्थ्य विभाग को दो भागों में बांटने और इससे संबंधित तीन मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (सीएमओ) की हत्या के संबंध में सीबीआई की स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) कई अहम सवाल किए गए।
मायावती के विशेष अनुरोध पर उनके कानूनी सलाहकार और बसपा सांसद सतीश चंद्र मिश्र भी पूछताछ के दौरान उनके साथ थे। इस दौरान मायावती कई अहम सवालों के जवाब देने से बचती रहीं। उन्होंने मुख्यमंत्री रहते किए गए कई विवादित फैसलों के प्रति अनभिज्ञता भी जताई।
मायावती से पूछताछ क्यों
मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग का बंटवारा कर दिया था। साथ ही जिला परियोजना अधिकारियों के 100 पद भी सृजित कर दिए थे। एनआरएचएम के क्रियान्वयन में इन अधिकारियों की भूमिका सवालों में हैं।
सीबीआई का आरोप है कि विभाग का बंटवारा इसलिए किया गया ताकि एनआरएचएम फंड को सीधे परिवार कल्याण विभाग के अधीन लाया जा सके। यह विभाग तत्कालीन मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के पास था।
कुशवाहा के खिलाफ पहले ही आरोप पत्र दाखिल हो चुका है। ऐसा माना जा रहा है कि करोड़ों रुपये के घोटाले के लिए यह फैसला भी अहम है।
जानें, क्या है एनआरएचएम घोटाला
स्वास्थ्य सुविधा और सस्ती दवाइयों के लिए केंद्र की रकम अपनी झोली में भर ली
मायावती के कार्यकाल (वर्ष 2007-12) के दौरान एनआरएचएम के लिए केंद्र से मिले पैसे का गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया। घोटाला 5700 करोड़ रुपये का है।
केंद्र की यह योजना 18 राज्यों में अप्रैल 2005 में सात सालों के लिए शुरू की गई थी। इसका मकसद ग्रामीण इलाकों में रहने वालों को अच्छी स्वास्थ्य सुविधा और सस्ती दवाइयां मुहैया कराना था। केंद्र ने इसके लिए यूपी को 8657 करोड़ रुपये का फंड दिया था।
इस रकम में से स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों, डॉक्टरों ने पांच हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम आपस में ही बंदरबांट कर ली। इसका खुलासा कैग की रिपोर्ट में हुआ। बाद में इस घोटाले की जांच सीबीआई के हवाले कर दी गई।
इसके बाद घोटाले में मंत्री, नेता और वरिष्ठ अधिकारियों के नाम भी सामने आए हैं। घोटाले से जुड़े तीन सीएमओ सहित तकरीबन 10 लोगों की जान जा चुकी है।
अपने नियम कानून बनाकर किया था 5700 करोड़ का घोटाला
सीएमओ परिवार कल्याण का पद सृजित कर खूब हुई पैसों की लूट
सीएजी रिपोर्ट में यह साफ हो गया है कि एनआरएचएम में करीब 5700 करोड़ रुपये का घोटाला तो सिर्फ अपने नियम और कानून बनाकर किया गया। वर्ष 2009-11 के बीच ज्यादातर काम सहकारी संस्थाओं के जरिए कराए। इन्हें करोड़ों रुपए एडवांस में दिए गए।
सीएमओ परिवार कल्याण का पद भी इसीलिए सृजित किया गया ताकि एनआरएचएम की रकम को ठिकाने लगाया जा सके। इन पदों पर तैनाती के लिए 35 से 40 लाख रुपये की बोली तक लगी थी। सीबीआई को भी जांच में यह तथ्य मिले हैं।
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में एनआरएचएम के पैसे केफर्जी ढंग से भुगतान, मनमाने ढंग से बगैर नियम कानून के खर्च का मामला पकड़ा है। जिलों में जाकर मौके पर जांच कर उनकी फोटो भी खींची थी। इसे रिपोर्ट में साक्ष्य के रूप में लगाया गया है। स्वास्थ्य केंद्रों के निर्माण में बड़ी धांधली हुई है।
इन विभागों को आवंटित हुआ था इतना धन
जांच रिपोर्ट में सामने आया है कि सहकारी संस्थाओं को करोड़ों रुपए एडवांस में दिए गए। इनमें यूपीएसआईसी को 65.99 करोड़ रुपये दवाएं और उपकरण खरीद के लिए मिले थे।
पैकफेड को 563 करोड़ निर्माण और मॉड्यूलर ऑपरेशन थियेटर के लिए, 286.71 करोड़ उत्तर प्रदेश प्रोजेक्ट कारपोरेशन लिमिटेड को मॉड्यूलर ओटी के लिए, जल निगम को 51.96 करोड़ निर्माण के लिए, लैकफेड को 45.37 करोड़ दवा और उपकरण खरीद के लिए, नेशनल कन्ज्यूमर कोऑपरेटिव फेडरेशन को 9.15 करोड़ टेलीमेडिसिन सुविधा के लिए दिए गए थे।
वर्ष 2008-11 के बीच यूपी स्माल स्केल इंडस्ट्रियल कारपोरेशन से 77.66 करोड़ के पांच करार किए गए। इसके तहत इंट्रा यूट्राइन डिवाइस किट, फर्स्ट रेफरल यूनिट, आरओ सिस्टम, चश्मे, प्रचार-प्रसार सामग्री खरीद के थे।
इसके तहत 65.99 करोड़ संस्था को एडवांस दे दिए गए। सीएजी ने पाया कि दवाओं और उपकरणों की आपूर्ति न केवल महंगे दामों पर खरीद कर की गई बल्कि खराब गुणवत्ता का सामान भेज दिया गया।