यूपी में जन्म लेने से पहले ही दम तोड़ रही है विपक्षी एकता, माया-मुलायम बने रोड़ा
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अखिलेश यादव ने रविवार को पटना में विपक्षी एकता के लिए हो रही लालू यादव की रैली में शामिल होने की घोषणा कर दी है। इससे भले ही लोकसभा और विधानसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन के बूते भाजपा को पटखनी देने के दावे किए जा रहे हों लेकिन उत्तर प्रदेश में तो एका की यह कोशिश जन्म लेने से पहले ही दम तोड़ती नजर आ रही है।
बसपा सुप्रीमो मायावती ने विपक्षी दलों के साथ मंच साझा करने से पहले सीटों के बंटवारे को लेकर स्थिति साफ करने की शर्त रखी है। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने भी अखिलेश यादव के पटना रैली में शामिल होने पर सवाल उठाते हुए गठबंधन का विरोध किया है। मतलब साफ है कि पटना रैली से दूसरे राज्यों में भाजपा के खिलाफ कोई मोर्चा भी बन जाए। लेकिन उत्तर प्रदेश में भाजपा की राह में रोड़े अटकाने से पहले उसे अपनी कई आपसी मुश्किलों से दो-चार होना पड़ेगा। जिनसे पार पाना कठिन चुनौती साबित होगा।
मुलायम का रुख महत्वपूर्ण
भले ही मुलायम सिंह यादव आज सपा की राजनीति के केंद्र में न हों। उनकी सलाह की पार्टी के निर्णयों में कोई भूमिका न हो। बावजूद इसके शायद ही कोई इससे इन्कार करे कि प्रदेश में आज भी एक बड़े वर्ग पर उनका प्रभाव है। खासतौर से पिछड़ों-यादवों में। प्रदेश में लगभग नौ प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली इस बिरादरी में उनकी पकड़ कमजोर नहीं लगती।
माना जाता है कि सपा को अपने जन्म के बाद से इस बार विधानसभा में 50 से भी कम सीटें इसीलिए मिलीं क्योंकि मुलायम को पार्टी में हाशिए पर डाल दिया गया। ऐसे में जिस तरह मुलायम ने ‘गठबंधन होने पर कुछ और सोचने की’ की चेतावनी दी है, उससे साफ है कि गठबंधन को भाजपा से पहले मुलायम से ही मुकाबला करना होगा।
मायावती की गुत्थी सुलझना आसान नहीं
पटना रैली से 72 घंटे पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने लखनऊ में पत्रकारों को बुलाकर सीटों का बंटवारा तय करने की शर्त रख दी। उनकी यह मांग उत्तर प्रदेश में गठबंधन के भविष्य की राह में मुश्किलों को बताने वाला है। हालांकि उन्होंने साफ किया कि उन्हें यह शर्त इसलिए रखनी पड़ी कि पटना रैली की सफलता के बावजूद सीटों के बंटवारे को लेकर झगड़ा न हो। एक-दूसरे की पीठ में छुरा न भोंका जाए।
राजनीति न समझने वाले भी इससे साफ जान सकते हैं कि सीटों के बंटवारे की स्थिति साफ नहीं होने वाली और मायावती पटना रैली में नहीं जाने वाली। बसपा का इतिहास देखें तो साफ समझ आता है कि मायावती किसी दूसरे नेता के नेतृत्व को बहुत दिन स्वीकार नहीं करती हैं।
वर्ष 1995 में बसपा और सपा के गठबंधन में टूट और तीन बार भाजपा से अलगाव इसका प्रमाण है। जाहिर है कि सीटों का बंटवारा हो भी जाए तो नेतृत्व पर बात अटक जाएगी।
इसलिए भी खड़ी हैं मुश्किलें
पटना रैली में अभी सोनिया या राहुल के शामिल होने पर भी तस्वीर साफ नहीं है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर भी जब-तब गठबंधन के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं। बावजूद इसके अगर कांग्रेस का कोई प्रमुख नेता रैली में शामिल भी हो जाए तो यूपी में विपक्षी एका की गुत्थी सुलझते नहीं दिखती।
कारण, गठबंधन में किसी का नेतृत्व स्वीकार करने की मजबूरी भले ही अभी किसी के सामने न हो पर, मायावती की शर्त से साफ है कि वह अब धोखा नहीं खाना चाहतीं। इससे आज नहीं तो कल नेतृत्व का सवाल उठेगा जरूर।
उधर अखिलेश भले ही विधानसभा चुनाव के बाद बसपा को लेकर नरम रुख जाहिर करते आए हों लेकिन वह मायावती का नेतृत्व मानेंगे, इसकी संभावना भी कम ही है। इसी तरह मायावती का भी अखिलेश के नेतृत्व में काम करना मुश्किल ही लगता है।