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मौत आई तो जिंदगी ने कहा, आपका ट्रंककॉल है साहब...
Sat, 13 Apr 2019 01:10 AM IST
sahaj sahaj
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
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Published by: sahaj sahaj
Updated Sat, 13 Apr 2019 01:10 AM IST
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कवि प्रदीप चौबे
- फोटो : अमर उजाला
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हंसमुख और मिलनसार स्वभाव के कवि प्रदीप चौबे की एक गजल का मतला है कि ‘हर तरफ गोलमाल है साहब, आपका क्या खयाल है साहब’। इसके आगे वे अक्सर कहा करते थे-‘मौत आई तो जिंदगी ने कहा, आपका ट्रंककाल है साहब..।’ अब ट्रंककाल का जमाना नहीं रहा, फिर भी क्रूर काल ने प्रदीप चौबे को उनकी हास्य कविताएं सुनने के लिए आवाज देकर अपने पास बुला ही लिया। प्रदीप चौबे से मेरी पारिवारिक मित्रता 1975 से रही है। जब मेरी बेटी ग्वालियर में पढ़ रही थी, तब वे उसके लोकल गार्जियन हुआ करते थे। यूं तो वे हास्य कवि थे ही, लेकिन गज़लें कहने में भी उनका अपना अलग मुकाम था। उनके गजल संग्रह खुदा गायब है, बहुत प्यासा है पानी... को जिन्होंने पढ़ा है, वो इसे समझ सकते हैं।
वे अपनी लंबी हास्य कविताओं जैसे रेल यात्रा और शव यात्रा के जरिए कवि सम्मेलन के मंचों पर आए थे और चर्चित हो गए। बाद में वे आलपिन शीर्षक से माइक्रो हास्य कविताएं लिखने लगे थे। वे कहा करते थे कि चुटकुलों के विपरीत छोटी हास्य कविताएं अब अधिक प्रभाव डालती हैं। बाप रे बाप उनकी हास्य व्यंग्य कविताओं का पहला संग्रह है। प्रदीप चौबे की कुल सात पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। लखनऊ में उनकी रिश्तेदारी तो थी ही। अस्सी और नब्बे के दशक के लखनऊ के काव्य मंचों पर वे अनिवार्य रूप से उपस्थित भी दिखते थे।
पहला अट्टहास युवा रचनाकार सम्मान मिला
जब लखनऊ से अट्टहास शिखर सम्मान और अट्टहास युवा रचनाकार सम्मान शुरू हुआ तो वर्ष 1980 का पहला युवा सम्मान उन्हें ही दिया गया। बाद में उन्हें अट्टहास शिखर सम्मान भी लखनऊ महोत्सव के मंच पर मिला था। लखनऊ दूरदर्शन के तब के अधिकांश कवि सम्मेलन उनके बिना पूरे नहीं होते थे। प्रदीप चौबे 1985 में पहली बार लखनऊ दूरदर्शन के कवि सम्मेलन में आए। चार माह पहले दिसंबर में उनके बड़े बेटे का एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया था। इसके बावजूद ‘शो मस्ट गो ऑन’ कहने वाले प्रदीप अस्वस्थ होते हुए भी सक्रिय रहते। उनके संपादन में वैश्विक गज़लों के चार संकलन प्रकाशित हुए हैं। 12 से अधिक देशों में वे कविता पाठ के लिए बुलाए गए। उनको मिले प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से चकल्लस पुरस्कार, काका हाथरसी पुरस्कार, टेपा पुरस्कार प्रमुख हैं। प्रदीप चौबे को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा के हाथों लोकप्रिय हास्य-व्यंग्य कवि का सम्मान भी मिल चुका था।
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-सूर्यकुमार पांडेय, वरिष्ठ हास्य कवि एवं व्यंग्यकार
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वे अपनी लंबी हास्य कविताओं जैसे रेल यात्रा और शव यात्रा के जरिए कवि सम्मेलन के मंचों पर आए थे और चर्चित हो गए। बाद में वे आलपिन शीर्षक से माइक्रो हास्य कविताएं लिखने लगे थे। वे कहा करते थे कि चुटकुलों के विपरीत छोटी हास्य कविताएं अब अधिक प्रभाव डालती हैं। बाप रे बाप उनकी हास्य व्यंग्य कविताओं का पहला संग्रह है। प्रदीप चौबे की कुल सात पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। लखनऊ में उनकी रिश्तेदारी तो थी ही। अस्सी और नब्बे के दशक के लखनऊ के काव्य मंचों पर वे अनिवार्य रूप से उपस्थित भी दिखते थे।
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पहला अट्टहास युवा रचनाकार सम्मान मिला
जब लखनऊ से अट्टहास शिखर सम्मान और अट्टहास युवा रचनाकार सम्मान शुरू हुआ तो वर्ष 1980 का पहला युवा सम्मान उन्हें ही दिया गया। बाद में उन्हें अट्टहास शिखर सम्मान भी लखनऊ महोत्सव के मंच पर मिला था। लखनऊ दूरदर्शन के तब के अधिकांश कवि सम्मेलन उनके बिना पूरे नहीं होते थे। प्रदीप चौबे 1985 में पहली बार लखनऊ दूरदर्शन के कवि सम्मेलन में आए। चार माह पहले दिसंबर में उनके बड़े बेटे का एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया था। इसके बावजूद ‘शो मस्ट गो ऑन’ कहने वाले प्रदीप अस्वस्थ होते हुए भी सक्रिय रहते। उनके संपादन में वैश्विक गज़लों के चार संकलन प्रकाशित हुए हैं। 12 से अधिक देशों में वे कविता पाठ के लिए बुलाए गए। उनको मिले प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से चकल्लस पुरस्कार, काका हाथरसी पुरस्कार, टेपा पुरस्कार प्रमुख हैं। प्रदीप चौबे को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा के हाथों लोकप्रिय हास्य-व्यंग्य कवि का सम्मान भी मिल चुका था।
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-सूर्यकुमार पांडेय, वरिष्ठ हास्य कवि एवं व्यंग्यकार