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यूपी चुनाव 2022: पूर्व विधानसभा अध्यक्ष बोले- सपा कहीं भी कमजोर नहीं, हर बूथ पर हमारे कार्यकर्ता, 350 से ज्यादा सीटें जीतेंगे

Mon, 10 Jan 2022 12:01 PM IST
ishwar ashish चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ
चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Mon, 10 Jan 2022 12:01 PM IST
सार

दो बार विधानसभा अध्यक्ष बनने वाले माता प्रसाद पांडेय का कहना है कि सपा किसी भी स्तर पर कमजोर नहीं है। समाजवाद की लहर चल रही है। समाजवादी सरकार बनाने के लिए जनता व्याकुल है। जहां तक सीटों का सवाल है, तो सपा 350 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज करेगी। पढ़ें, पूरी बातचीत:

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Mata Prasad pandey interview by Chandrabhan Yadav.
माता प्रसाद पांडेय - फोटो : amar ujala

विस्तार

सिद्धार्थनगर के इटवा क्षेत्र से निकलकर दो बार विधानसभा अध्यक्ष बनने वाले माता प्रसाद पांडेय फिर से चुनावी तैयारी में जुटे हैं। वह कहते हैं, यह चुनाव समाजवाद बनाम फासीवाद और पूंजीवाद का है। जीत समाजवाद की होगी। उनका दावा है कि सपा 350 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज करेगी। पेश हैं चंद्रभान यादव से उनकी बातचीत के प्रमुख अंश...

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सवाल: समाजवादी पार्टी की क्या स्थिति है? चुनाव में कितनी सीटें मिलने की उम्मीद है?
जवाब:
देखिए, यह चुनाव समाजवाद बनाम फासीवाद और पूंजीवाद का है। जीत समाजवाद की ही होगी। पार्टी के हर नेता और कार्यकर्ता डटे हैं। भाजपा के कुकर्म का जवाब मिलेगा। इस चुनाव में भाजपा का कनात उखड़ जाएगा। उसका सिमटना तय है। इतिहास गवाह है, जिसने भी अन्नदाता का अपमान किया, वह तबाह हुआ है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में मैं जाकर देख चुका हूं। समाजवाद की लहर चल रही है। समाजवादी सरकार बनाने के लिए जनता व्याकुल है। जहां तक सीटों का सवाल है, तो सपा 350 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज करेगी। किसान हो, नौजवान हो, व्यापारी हो या फिर महिलाएं हों, हर वर्ग समाजवादी सरकार चाहता है। सभी की चाहत पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने की है।
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सवाल: भाजपा चुनाव को लेकर कई स्तर पर रणनीति बना चुकी है। सपा की क्या रणनीति है?
जवाब:
सपा ने हर स्तर पर तैयारी की है। पार्टी का एक-एक कार्यकर्ता बूथ पर डटा है। जनता व्यवस्था परिवर्तन को लेकर पूरी तरह से सजग है। सपा किसी भी स्थिति में भाजपा से कमजोर नहीं है। हम हर स्तर पर तैयारी कर चुके हैं। यह चुनाव इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव जैसा बदलाव दिखाएगा। वर्ष 2022 ही नहीं 2024 में भी बदलाव होगा। हमने कई चुनाव देखे हैं। इस बार 2012 से भी ज्यादा उमंग है। समीकरण भी हमारे पक्ष में हैं। हर जाति और धर्म का वोट हमें मिल रहा है।
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सवाल: भाजपा के वरिष्ठ नेता तो कह रहे हैं कि वे पांडव हैं, बाकी सब कौरव। इस टिप्पणी को किस रूप में देखते हैं?
जवाब:
भाजपा और भाजपा के उस नेता को खुद का आकलन करना चाहिए। चुनाव के समय महिलाओं की साड़ी किसने खींची, यह जग जाहिर है। ऐसे नेता को इतिहास से सबक लेना चाहिए। महिलाओं की साड़ी खींचने वाले कौरव थे। महिलाओं के अपमान की उन्हें सजा मिली थी। समाजवादी लोग महिलाओं को सम्मान देते हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इस बार के संकल्प पत्र में भी उनके सम्मान के लिए कई घोषणाएं करेंगे। भाजपा की उद्दंडता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पंचायत चुनाव में मेरे जैसे व्यक्ति के साथ भी दुर्व्यवहार हुआ। मैं उम्र और सियासी सफर के लिहाज से वरिष्ठ हूं, लेकिन भाजपाइयों ने इसका भी ध्यान नहीं रखा।

सवाल: सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भगवान परशुराम मंदिर में पूजन-अर्चन किया। इसे लेकर भाजपा तरह-तरह के आरोप लगा रही है?
जवाब:
कोई कुछ भी आरोप लगा ले, लेकिन समाजवादी पार्टी ने हमेशा ब्राह्मणों को सम्मान दिया है। भगवान परशुराम के नाम पर अवकाश की घोषणा पार्टी संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने की थी। उस वक्त तमाम शंकराचार्र्यों ने खुले मंच से कहा था कि मुलायम सिंह यादव ने बहादुरी का काम किया है। अखिलेश यादव ने ब्राह्मणों को मंत्री से लेकर चेयरमैन तक बनाया। ब्राह्मण समाज हमेशा समाजवाद का पोषक रहा है। उसने समाज के बीच जो भी नियम बनाए, उसके पीछे मूल वजह थी कि समाजवाद की अवधारणा कायम रहे।


सवाल: पहले और अब के चुनाव में किस तरह का बदलाव देखते हैं?
जवाब:
पहले चुनाव अपने नेता के लिए जनता लड़ती थी। वर्ष 1980 के चुनाव में हमें 16 हजार चंदा मिला था, जिसमें 13 हजार खर्च हुए। अन्य चुनाव में भी यही हाल रहा। हम हमेशा बिना रुपये के चुनाव लड़ते रहे और जीतते रहे। पैदल गांव की यात्रा होती। जहां रात हो जाती, वहीं रुक जाते थे। 90 के दशक में मोटरसाइकिल से प्रचार शुरू हुआ। अब चुनाव का पैटर्न बदला है। तब नैतिकता और मुद्दे की लड़ाई थी। दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एक दल के लोग दूसरे दलों के लोगों की वरिष्ठता का सम्मान करते थे। तब न होर्डिंग होती थी और न ही प्रचार के दूसरे साधन। अब सब कुछ बदल गया है। चुनाव में कटुता बढ़ी है। अवसरवादिता हावी है। हक के बजाय व्यक्तिगत हित का ज्यादा ख्याल रखा जा रहा है। यह समस्या नेता के साथ भी है और कार्यकर्ताओं के साथ भी।

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