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सोपोर आतंकी हमले में शहीद हुए रायबरेली के शैलेंद्र सिंह का पार्थिव शरीर पहुंचा पैतृक गांव, बेटे ने दी पिता को सलामी
Tue, 06 Oct 2020 07:53 PM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, रायबरेली
अमर उजाला नेटवर्क, रायबरेली
Published by: शाहरुख खान
Updated Tue, 06 Oct 2020 07:53 PM IST
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बेटे ने दी पिता को सलामी
- फोटो : अमर उजाला
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जन्मू-कश्मीर के सोपोर में सोमवार को आतंकी हमले में शहीद हुए यूपी के रायबरेली जिले के लाल शैलेंद्र प्रताप सिंह का पार्थिव शरीर गांव पहुंचा। पार्थिव शरीर को देख हर किसी की आंखें नम हो गईं। इस दौरान वहां मौजूद लोगों का पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा। लोगों ने पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए।
सीआरपीएफ के डीआईजी भी शहीद शैलेंद्र सिंह के घर पहुंचे। शैलेंद्र सिंह का पार्थिव शरीर रायबरेली पहुंचते ही हर तरफ जब तक सूरज चांद रहेगा शैलेंद्र तेरा नाम रहेगा की गूंज सुनाई दी। पार्थिव शरीर पहुंचने पर शैलेंद्र के बेटे कुशाग्र ने अपने पिता को सलामी दी। बुधवार को अंतिम संस्कार किया जाएगा।
मूलरूप से डलमऊ कोतवाली क्षेत्र के मीर मीरानपुर गांव के रहने वाले शैलेंद्र प्रताप सिंह वर्ष 2008 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे। इस समय उनकी तैनाती सीआरपीएफ की 110वीं कंपनी में सोपोर में थी।
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आतंकियों से मोर्चा लेते हुए शैलेंद्र को गोली लगी, जिससे वह शहीद हो गए। शहीद के पिता नरेंद्र बहादुर सिंह रिटायर्ड आईटीआई कर्मी और मां सिया दुलारी सिंह गृहणी हैं। पत्नी चांदनी उर्फ दीपा व आठ साल का बेटा कुशाग्र है।
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सीआरपीएफ के डीआईजी भी शहीद शैलेंद्र सिंह के घर पहुंचे। शैलेंद्र सिंह का पार्थिव शरीर रायबरेली पहुंचते ही हर तरफ जब तक सूरज चांद रहेगा शैलेंद्र तेरा नाम रहेगा की गूंज सुनाई दी। पार्थिव शरीर पहुंचने पर शैलेंद्र के बेटे कुशाग्र ने अपने पिता को सलामी दी। बुधवार को अंतिम संस्कार किया जाएगा।
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मूलरूप से डलमऊ कोतवाली क्षेत्र के मीर मीरानपुर गांव के रहने वाले शैलेंद्र प्रताप सिंह वर्ष 2008 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे। इस समय उनकी तैनाती सीआरपीएफ की 110वीं कंपनी में सोपोर में थी।
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आतंकियों से मोर्चा लेते हुए शैलेंद्र को गोली लगी, जिससे वह शहीद हो गए। शहीद के पिता नरेंद्र बहादुर सिंह रिटायर्ड आईटीआई कर्मी और मां सिया दुलारी सिंह गृहणी हैं। पत्नी चांदनी उर्फ दीपा व आठ साल का बेटा कुशाग्र है।
शैलेंद्र में बचपन से था देश के लिए मर मिटने का जुनून
शैलेंद्र सिंह पर बचपन से ही देश के लिए कुछ कर गुजरने और मर मिटने का जुनून सवार था। अक्सर वह अपने पिता से कहा करता था कि उसे कोई नौकरी नहीं चाहिए। उसका सपना है कि वह देश की तरफ आंख उठाने वालों को कड़ा सबक सिखाए।
शहीद के चाचा वीरेंद्र सिंह बताते हैं कि शैलेंद्र कहता था कि जब भी हमारा कोई साथी जवान शहीद होता है तो बहुत दुख होता है। इसलिए जब मौका मिलता है मैं आतंकियों और पाकिस्तानी सेना से मोर्चा लेकर उन्हें सबक सिखाने का काम करता हूं। उसका यही जुनून देश सेवा में समर्पित हो गया।
उन्होंने बताया कि शहीद शैलेंद्र सिंह गांव के संगी-साथियों के साथ सेना में जाने की तैयारी करता था। इसके लिए रोज पांच किलोमीटर की दौड़ लगाने के साथ ही शारीरिक व्यायाम किया करता था। पिता नरेंद्र बहादुर सिंह कहते हैैं कि शैलेंद्र को देश भक्ति की फिल्में देखने में रुचि रहती थी। वर्ष 2008 में मेहनत के बाद सीआरपीएफ में नौकरी मिली और सेना में जाने का उसका ख्याब पूरा हुआ। 10 साल पहले चांदनी से उसकी शादी हुई थी। शादी बाद उसका एक बेटा कुशाग्र है।
शहर में मकान बनाने के बाद भी शैलेंद्र का गांव जाना कम नहीं हुआ। छुट्टी पर आने पर वह बराबर गांव जाता था और अपने साथियों से मुलाकात करता था। उन्होंने बताया कि जब शैलेंद्र छुट्टी से घर आता था तो साथ में खेल किट लाता था और गांव के युवाओं को देता था। साथ ही युवाओं में सेना में जाने के लिए जोश भरता था। उन्हें प्रैक्टिस कराता था।
शहीद के चाचा वीरेंद्र सिंह बताते हैं कि शैलेंद्र कहता था कि जब भी हमारा कोई साथी जवान शहीद होता है तो बहुत दुख होता है। इसलिए जब मौका मिलता है मैं आतंकियों और पाकिस्तानी सेना से मोर्चा लेकर उन्हें सबक सिखाने का काम करता हूं। उसका यही जुनून देश सेवा में समर्पित हो गया।
उन्होंने बताया कि शहीद शैलेंद्र सिंह गांव के संगी-साथियों के साथ सेना में जाने की तैयारी करता था। इसके लिए रोज पांच किलोमीटर की दौड़ लगाने के साथ ही शारीरिक व्यायाम किया करता था। पिता नरेंद्र बहादुर सिंह कहते हैैं कि शैलेंद्र को देश भक्ति की फिल्में देखने में रुचि रहती थी। वर्ष 2008 में मेहनत के बाद सीआरपीएफ में नौकरी मिली और सेना में जाने का उसका ख्याब पूरा हुआ। 10 साल पहले चांदनी से उसकी शादी हुई थी। शादी बाद उसका एक बेटा कुशाग्र है।
शहर में मकान बनाने के बाद भी शैलेंद्र का गांव जाना कम नहीं हुआ। छुट्टी पर आने पर वह बराबर गांव जाता था और अपने साथियों से मुलाकात करता था। उन्होंने बताया कि जब शैलेंद्र छुट्टी से घर आता था तो साथ में खेल किट लाता था और गांव के युवाओं को देता था। साथ ही युवाओं में सेना में जाने के लिए जोश भरता था। उन्हें प्रैक्टिस कराता था।