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खासियत से भरपूर है प्रेसिडेंशियल ट्रेन, सुरक्षा घेरे में रहेगी, आम लोगों को नहीं हो सकेंगे दीदार

Sat, 26 Jun 2021 01:51 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sat, 26 Jun 2021 01:51 AM IST
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many usp in presidential train
राष्ट्रपति जिस प्रेसिडेंशियल ट्रेन से लखनऊ आ रहे हैं, वह खासियतों से भरी हुई है। एक तरफ जहां इसका इतिहास रोचक है, वहीं इसकी अत्याधुनिक सुविधाएं भी खास हैं। ट्रेन कड़ी सुरक्षा में रहेगी। आम लोग इस ट्रेन को देख नहीं सकेंगे। चारबाग रेलवे स्टेशन के इतिहास में पहली बार प्रेसिडेंशियल ट्रेन यहां आ रही है।
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रेलवे अधिकारियों ने बताया कि राष्ट्रपति जिस ट्रेन से यात्रा करते हैं, उसे प्रेसिडेंशियल सलून भी कहते हैं। यह ट्रेन की श्रेणी में नहीं आता है। इसमें दो कोच होते हैं, जिनका नंबर 9000 व 9001 होता है। अब तक देश के अलग-अलग राष्ट्रपति 87 बार इस सैलून का प्रयोग कर चुके हैं। रेलवे से जुड़े विशेषज्ञों ने बताया कि वर्ष 1950 में पहली बार राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने दिल्ली से कुरुक्षेत्र का सफर प्रेसिडेंशियल ट्रेन से किया था। इसी क्रम में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और डॉ. नीलम संजीवा रेड्डी ने भी प्रेसिडेंशियल ट्रेन से सफर किया था। इसका नियमित रूप से इस्तेमाल 1960 से 1970 के बीच होता रहा। उसके करीब 26 साल बाद वर्ष 2003 में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने इससे बिहार की यात्रा की थी और अब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद इस ट्रेन से सफर कर रहे हैं।
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ये हैं सुविधाएं :
बुलेट प्रूफ विंडो
जीपीआरएस सिस्टम
पब्लिक एड्रेस सिस्टम
सैटेलाइट आधारित कम्युनिकेशन सिस्टम
डाइनिंग रूम
विजिटिंग रूम
लाउंज
कॉन्फ्रेंस रूम
ट्रेन का इतिहास :
इतिहासकार हफीज किदवई ने बताया कि प्रेसिडेंशियल ट्रेन का प्रयोग 19वीं शताब्दी में किया जाता था। सबसे पहले क्वीन विक्टोरिया ने इसका प्रयोग किया था, फिर यह चलन में आ गया था। इसके बाद 1927 में इसे कलकत्ता में सुरक्षित रख दिया गया। इसे वाइस रीगल कोच के नाम से भी जाना जाता था। इस ट्रेन में पर्शिया की कालीनों से लेकर सिंकिंग सोफे रहते थे। एसी की सुविधा नहीं थी, इसलिए एयर कूलिंग के लिए खस मैट का इस्तेमाल किया जाता था।
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