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जिसने आदेश दिया था कि प्रदेश में जाति के नाम पर स्कूल नहीं चलेंगे
Thu, 11 Apr 2019 10:35 PM IST
Amulya Rastogi
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Thu, 11 Apr 2019 10:35 PM IST
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चौधरी चरण सिंह (फाइल फोटो)
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चौधरी चरण सिंह कांग्रेस से अलग हुए तो उनके समर्थकों ने प्रदेश भर में खुशियां मनाईं। वजह यह थी कि वे लोग मान रहे थे कि कांग्रेस, चौधरी साहब के साथ अन्याय कर रही है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को जब चौधरी साहब के पार्टी से अलग होने की जानकारी हुई तो वह सकते में आ गया।
उसने उनके पास दूत दौड़ाए लेकिन चौधरी साहब फैसला बदलने को तैयार नहीं थे। दूतों से उन्होंने कहा, ‘अब बहुत देर हो चुकी है। पुनर्विचार की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो गई है। कांग्रेस की तत्कालीन सरकार अल्पमत में आ गई। उधर, विरोधी दलों ने बैठक की और रामचंद्र विकल को अपना नेता चुन लिया। पर, उन्होंने तत्काल अपना त्यागपत्र दे दिया और कहा, ‘चौधरी चरण सिंह को ही हम सब अपना नेता स्वीकार करते हैं।’
इसके बाद सभी लोग चौधरी साहब के घर की तरफ चल दिए। चौधरी साहब अंदर कमरे में थे। विपक्षी दल के विधायक उनके यहां पहुंचे और नारे लगाने लगे तो वह बाहर आए। कुछ लोग उनके पैरों में लिपट गए तथा और तेज स्वरों में नारे लगाने लगे। चौधरी साहब फिर अंदर लौट गए। चौधरी साहब को नेता चुन लिया गया और तय हो गया कि वह अगले मुख्यमंत्री होंगे।
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एक और कबीर पुस्तक के एक संस्मरण से पता चलता है, ‘चौधरी साहब ने 3 अप्रैल को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लखनऊ में पहली बार राजभवन के हाल से बाहर लॉन में पंडाल बना। जिसमें आम लोगों को बुलाया गया। चौधरी साहब को लोग जातिवादी नेता कह देते हैं पर, उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद एक रोचक आदेश किया कि प्रदेश में अब कोई शिक्षण संस्था जाति-सूचक नाम से नहीं चलेगी। दूसरे दिन ही सभी जगह से ऐसे पट्ट हटा लिए गए।’
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उसने उनके पास दूत दौड़ाए लेकिन चौधरी साहब फैसला बदलने को तैयार नहीं थे। दूतों से उन्होंने कहा, ‘अब बहुत देर हो चुकी है। पुनर्विचार की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो गई है। कांग्रेस की तत्कालीन सरकार अल्पमत में आ गई। उधर, विरोधी दलों ने बैठक की और रामचंद्र विकल को अपना नेता चुन लिया। पर, उन्होंने तत्काल अपना त्यागपत्र दे दिया और कहा, ‘चौधरी चरण सिंह को ही हम सब अपना नेता स्वीकार करते हैं।’
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इसके बाद सभी लोग चौधरी साहब के घर की तरफ चल दिए। चौधरी साहब अंदर कमरे में थे। विपक्षी दल के विधायक उनके यहां पहुंचे और नारे लगाने लगे तो वह बाहर आए। कुछ लोग उनके पैरों में लिपट गए तथा और तेज स्वरों में नारे लगाने लगे। चौधरी साहब फिर अंदर लौट गए। चौधरी साहब को नेता चुन लिया गया और तय हो गया कि वह अगले मुख्यमंत्री होंगे।
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एक और कबीर पुस्तक के एक संस्मरण से पता चलता है, ‘चौधरी साहब ने 3 अप्रैल को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लखनऊ में पहली बार राजभवन के हाल से बाहर लॉन में पंडाल बना। जिसमें आम लोगों को बुलाया गया। चौधरी साहब को लोग जातिवादी नेता कह देते हैं पर, उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद एक रोचक आदेश किया कि प्रदेश में अब कोई शिक्षण संस्था जाति-सूचक नाम से नहीं चलेगी। दूसरे दिन ही सभी जगह से ऐसे पट्ट हटा लिए गए।’