सिर्फ 20 सेकेंड में होगी मलेरिया की जांच
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नैनो टेक्नोलॉजी ने चिकित्सा विज्ञान में हमें नॉन-इन्वेसिव रैपिड मलेरिया डायग्नोस जैसी तकनीक दी है जो 20 सेकंड में बता सकती है कि व्यक्ति को मलेरिया है या नहीं।
भारत में इसका उपयोग बड़े स्तर पर मलेरिया की जांच के लिए किया जा सकता है। हालांकि यह तकनीक करीब 20 हजार डॉलर कीमत के साथ फिलहाल बेहद महंगी है, लेकिन जैसे-जैसे तकनीक सस्ती होती जाएगी, इसकी उपयोगिता बढ़ती जाएगी।
यह कहना है 1966 में केमिस्ट्री में नोबल पुरस्कार पा चुके प्रो. रॉबर्ट एफ कर्ल जूनियर का जो शनिवार को लखनऊ में मौजूद थे। वे एसजीपीजीआई के 26वें स्थापना दिवस में बतौर मुख्य वक्ता शामिल हुए थे।
नैनो टेक्नोलॉजी को लेकर प्रो. कर्ल ने कहा कि दुनिया भर में आज चिकित्सा विज्ञान इसी में दवाओं का भविष्य देख रहा है। लेकिन पूरी तरह इस पर निर्भर नहीं हुआ जा सकता। प्रो. कर्ल ने कहा कि नैनो टेक्नोलॉजी भविष्य के दवा विज्ञान का एक हिस्सा हो सकती है।
भारत को जरूरत इस तकनीक की
वहीं भारत में चिकित्सा विज्ञान में नैनो टेक्नोलॉजी के उपयोग पर प्रो. कर्ल ने कहा कि निश्चित तौर पर एक बड़ी आबादी को इसकी जरूरत है। अब तक नैनो-मेडिसिन और नैनो पार्टिकल्स से बनी दवाओं की कीमतें और इस तकनीक पर आधारित जांचें महंगी बनी हुई हैं।
उन्होंने नॉन-इन्वेसिव रैपिड मलेरिया डायग्नोस का उदाहरण दिया और कहा कि अफ्रीका में इसके जरिये अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने गांवों में जांचें की हैं, लेकिन यह खर्चीला साबित हुआ है। भारत में एयरपोर्ट और चेक पॉइंट्स पर इसका इस्तेमाल हो सकता है जहां संसाधनों की कमी नहीं है। विस्तृत तौर पर इसके उपयोग के लिए तकनीक के सस्ता होने का इंतजार करना होगा।
कहा जाता है कि जब प्रो. कर्ल नौ वर्ष के थे, उनके माता-पिता ने उन्हें केमिस्ट्री की पुस्तकों का एक सेट दिया था। इसे पढ़ते हुए अगले एक हफ्ते में उन्होंने तय कर लिया कि वे केमिस्ट्री का साथ जीवन भर नहीं छोड़ेंगे और इसी ने उन्हें नोबल दिलवाया।
प्रो. कर्ल ने अभिभावकों को सुझाव दिया है कि वे अपने बच्चों को विभिन्न क्षेत्रों से परिचित कराएं ताकि उन्हें अपनी रुचियों के मुताबिक सही क्षेत्र चुनने का मौका मिल सके।