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जानिए, यूपी में क्यो मुश्किल है महामोर्चे का सपना?

Wed, 12 Nov 2014 09:15 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 12 Nov 2014 09:15 AM IST
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Mahamorcha cant be fruitful in uttarpradesh.

इसे सियासत का विचित्र संयोग ही कहा जाएगा कि कभी गैर कांग्रेसी राजनीति की धारा से निकले और बढ़े नेताओं को अब गैर भाजपा दलों का मोर्चा बनाने की जरूरत दिखने लगी।

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हालांकि इस सवाल का बिल्कुल सटीक जवाब ढूंढ पाना अभी मुश्किल है कि मुलायम सिंह यादव की पुराने साथियों को साथ लेकर भाजपा के विरुद्ध महामोर्चा बनाने की कोशिश कितनी कामयाब होगी।
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अलबत्ता यह जरूर कहा जा सकता है कि यूपी में इस महामोर्चे का सियासत में बहुत असरदार हो पाना मुश्किल ही है।

यूपी की सियासत में भाजपा के खिलाफ सपा, बसपा और कांग्रेस ही मुख्य रूप से दिखते हैं। महामोर्चे में शामिल लालू यादव के राजद, शरद यादव व नीतीश कुमार के जनता दल (यूनाइटेड) का सूबे में बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं दिखता है।
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देवगौड़ा के जनता दल (सेक्युलर), इंडियन नेशनल लोकदल या सजपा जैसे दलों के यूपी में प्रभाव की बात भी दूर की कौड़ी है।

वैसे तो मुलायम के वामपंथी दलों के साथ मधुर रिश्तों को देखते हुए महामोर्चे को इन दलों का समर्थन या सहयोग मिलने की उम्मीद है। पर, उत्तर प्रदेश में जमीन पर इन दलों की भी पकड़ क्रमश: कमजोर ही होती जा रही है।

बसपा को साथ लाना चुनौती

Mahamorcha cant be fruitful in uttarpradesh.

यूपी में सपा को छोड़ भाजपा के विरोध में खड़े दो प्रमुख दलों की बात करें तो कांग्रेस या बसपा में किसी का भी महामोर्चे की छतरी के नीचे खड़े होना मुश्किल ही दिख रहा है।

हालांकि महामोर्चे के नेताओं ने कांग्रेस के साथ आने की उम्मीद जताकर उनकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने की पहल की है।

बावजूद इसके यह आसान नहीं दिखता क्योंकि कांग्रेस कभी नहीं चाहेगी कि उसका राष्ट्रीय दल का रुतबा खत्म हो जाए।

यह जरूर संभव है कि वह चुनाव में कुछ सीटों पर इस महामोर्चे की जीत के लिए प्रत्याशी न उतारे। रही बात बसपा की तो सपा मुखिया मुलायम सिंह और बसपा मुखिया मायावती का साथ खड़े होना लगभग असंभव ही है।

यूपी में जब तक बसपा किसी मोर्चे के साथ खड़ी नहीं होती, तब तक भाजपा विरोधी मतदाताओं की एकजुटता सिर्फ सपनों तक ही सीमित रहेगी।

पुरानी है मोर्चों के बनने और बिखरने की कहानी

Mahamorcha cant be fruitful in uttarpradesh.
हालांकि वरिष्ठ समाजवादी नेता और जनता पार्टी से जनता दल तक की टूट के गवाह रहे केके श्रीवास्तव का तर्क है कि भले ही संसद में मुलायम, लालू, शरद, नीतीश संख्या बल के आधार पर कमजोर दिख रहे हों, लेकिन सड़क पर काफी मजबूत हैं।

अभी तक मुश्किल यह थी कि लालू, शरद और नीतीश की तरफ से समाजवादियों के बीच मुलायम सिंह की मजबूती, दूसरे राज्यों में भी समाजवादी विचारकों के बीच उनके महत्व और उत्तर प्रदेश में उनकी जमीनी पकड़ को स्वीकार करने में हिचकिचाहट दिखती थी।

अब सभी ने मुलायम सिंह के घर आकर एक तरह से यह सच स्वीकार कर लिया है। उनकी समझ में आ गया है कि उत्तर प्रदेश और मुलायम के बगैर न तो कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा बन पाया था और न अब भाजपा के विरुद्ध बन पाएगा। इसलिए यह महामोर्चा भविष्य में भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकता है।

पहले साबित भी हो चुका है

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13 अगस्त को लालू यादव ने जब यूपी में मुलायम सिंह और मायावती में गठबंधन का सुझाव दिया था तो उसके कुछ ही क्षण बाद ही मायावती ने कहा था कि लालू को बताना चाहिए कि उनकी बहन व बेटी के साथ ‘स्टेट गेस्ट हाउस कांड’ जैसी घटना अगर घटी होती तो भी क्या वह ऐसा ही सुझाव देते।

माया ने अकेले दम पर चुनाव लड़ने की भी बात कही थी। दूसरी तरफ मुलायम ने टिप्पणी की थी कि लालू यादव अगर मायावती का हाथ पकड़कर ले आते हैं तो वे गठबंधन को तैयार हैं। जाहिर है इस तरह केे बोल बोलने वाले एक साथ कैसे खड़े होंगे।

इसलिए भी है मुश्किल

वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा गेम चेंजर की भूमिका में है। वह साथ नहीं आई तो उत्तर प्रदेश में गैर भाजपाई महामोर्चे का खेल बिगड़ सकता है।

बसपा को इनके साथ खड़े होने के बजाय खेल बिगाड़ने की भूमिका ही पसंद आएगी। कारण, मायावती व मुलायम में सियासी ही नहीं, बल्कि निजी तौर पर भी काफी तल्खी है। खासतौर से स्टेट गेस्ट हाउस कांड जैसी घटना को मायावती कभी नहीं भुला सकतीं।

दूसरी तरफ मुलायम के कुनबे के बहुत सारे लोग मायावती के नजदीक जाना पसंद नहीं करेंगे। सबसे बड़ा सवाल तो यह भी है कि मायावती व मुलायम में कोई भी एक-दूसरे को अपना नेता स्वीकार करने से रहा। कांग्रेस भी शायद ही मुलायम को नेता मानने को तैयार हो।

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