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पांच साल से कम उम्र में जानलेवा हो सकता है निमोनिया, जान लें लक्षण
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लखनऊ। सांस लेते समय सीने में गड्ढा पड़ना, ऑक्सीजन का स्तर 90 से कम होना, उम्र या लंबाई के हिसाब से वजन की कमी और टीकाकरण न होना, ये सभी लक्षण पांच साल से कम आयु वाले निमोनिया पीड़ित बच्चों के लिए बेहद घातक हैं। ऐसे लक्षण होने पर बच्चे को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के बजाय बड़े चिकित्सा संस्थान लेकर जाएं। बच्चे की जान बचाने के लिए यह बेहद जरूरी है। केजीएमयू के पीडियाट्रिक विभाग ने संस्थान में भर्ती होने वाले पांच साल से कम आयु के बच्चों पर अध्ययन करके जानलेवा निमोनिया के लक्षण तय किए हैं। इन लक्षणों को जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित किया गया है।
केजीएमयू के बाल रोग विभाग में भर्ती होने वाले बच्चों पर यह अध्ययन डॉ. आशुतोष कपूर, डॉ. शैली अवस्थी तथा डॉ. कृष्ण कुमार यादव ने किया है। डॉ. आशुतोष कपूर ने बताया कि पांच साल से कम आयु वाले बच्चों में निमोनिया एक बड़ा खतरा है। कई बार देखा गया है कि जानलेवा लक्षण होने के बावजूद प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर विशेषज्ञ इनकी पहचान नहीं कर पाते हैं। इसकी वजह से बच्चे की जान को खतरा हो जाता है, इसलिए अध्ययन के आधार पर कुछ विशिष्ट लक्षण तथा रेस्पिरेटरी इंडेक्स ऑफ सिक्योरिटी इन चिल्ड्रेन (रिस्क) तय किया गया है। इसके अनुसार कट ऑफ-3 पांच साल से कम आयु वाले निमोनिया पीड़ित बच्चों के लिए बेहद घातक है।
180 बच्चों पर किया गया शोध
यह शोध केजीएमयू के बाल रोग विभाग में भर्ती हुए 180 बच्चों पर किया गया। इसमें से 17 फीसदी बच्चों की मौत हो गई। बाकी बच्चों के मुकाबले इन 17 बच्चों में देखा गया कि उनमें उम्र या लंबाई के हिसाब से वजन की कमी थी, वे दूध नहीं पी रहे थे, ऑक्सीजन का स्तर 90 से कम था, शरीर में नीलापन, सीने में घरघराहट जैसे लक्षण ठीक हुए बच्चों के मुकाबले इनमेें काफी ज्यादा थे। इन लक्षणों के आधार पर स्कोर निकाला गया। कट ऑफ-3 में आने वाले 30 में से 12 बच्चों की मौत हुई। कट ऑफ-1 में 70 में से शून्य, कट ऑफ-2 में 51 में से एक, कट ऑफ-4 में 15 में से दो, कट ऑफ-5 या इससे ज्यादा में 14 में से दो बच्चों की मौत हुई।
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हर पांचवें बच्चे की मौत का कारण निमोनिया
डॉ. आशुतोष कपूर के अनुसार देश में पांच साल से कम आयु के बच्चों में होने वाली कुल मौत में से 20 फीसदी अकेले निमोनिया से होती हैं। इसका मतलब हर पांचवें बच्चे की मौत का कारण निमोनिया है। ये इंडिकेटर बच्चे को तुरंत इलाज देने के लिए तैयार किए गए हैं, जिससे कि उनकी जान बचाई जा सके।
अफ्रीकी देश में हुए शोध के आधार पर निकाले गए नंबर
केजीएमयू ने निमोनिया पीड़ित बच्चों के लिए विभिन्न संकेतकों के आधार पर नंबर देने की प्रणाली अफ्रीकी देश में हुए शोध के आधार पर विकसित की है। अफ्रीकी देश में एचआईवी, कुपोषित और अन्य बीमारी से पीड़ित बच्चों पर यह शोध किया गया था। इसी में विभिन्न पैरामीटर के आधार पर नंबर देने की प्रणाली विकसित की गई थी। निमोनिया के लिए इसे ही आधार बनाया गया है।
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केजीएमयू के बाल रोग विभाग में भर्ती होने वाले बच्चों पर यह अध्ययन डॉ. आशुतोष कपूर, डॉ. शैली अवस्थी तथा डॉ. कृष्ण कुमार यादव ने किया है। डॉ. आशुतोष कपूर ने बताया कि पांच साल से कम आयु वाले बच्चों में निमोनिया एक बड़ा खतरा है। कई बार देखा गया है कि जानलेवा लक्षण होने के बावजूद प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर विशेषज्ञ इनकी पहचान नहीं कर पाते हैं। इसकी वजह से बच्चे की जान को खतरा हो जाता है, इसलिए अध्ययन के आधार पर कुछ विशिष्ट लक्षण तथा रेस्पिरेटरी इंडेक्स ऑफ सिक्योरिटी इन चिल्ड्रेन (रिस्क) तय किया गया है। इसके अनुसार कट ऑफ-3 पांच साल से कम आयु वाले निमोनिया पीड़ित बच्चों के लिए बेहद घातक है।
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180 बच्चों पर किया गया शोध
यह शोध केजीएमयू के बाल रोग विभाग में भर्ती हुए 180 बच्चों पर किया गया। इसमें से 17 फीसदी बच्चों की मौत हो गई। बाकी बच्चों के मुकाबले इन 17 बच्चों में देखा गया कि उनमें उम्र या लंबाई के हिसाब से वजन की कमी थी, वे दूध नहीं पी रहे थे, ऑक्सीजन का स्तर 90 से कम था, शरीर में नीलापन, सीने में घरघराहट जैसे लक्षण ठीक हुए बच्चों के मुकाबले इनमेें काफी ज्यादा थे। इन लक्षणों के आधार पर स्कोर निकाला गया। कट ऑफ-3 में आने वाले 30 में से 12 बच्चों की मौत हुई। कट ऑफ-1 में 70 में से शून्य, कट ऑफ-2 में 51 में से एक, कट ऑफ-4 में 15 में से दो, कट ऑफ-5 या इससे ज्यादा में 14 में से दो बच्चों की मौत हुई।
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हर पांचवें बच्चे की मौत का कारण निमोनिया
डॉ. आशुतोष कपूर के अनुसार देश में पांच साल से कम आयु के बच्चों में होने वाली कुल मौत में से 20 फीसदी अकेले निमोनिया से होती हैं। इसका मतलब हर पांचवें बच्चे की मौत का कारण निमोनिया है। ये इंडिकेटर बच्चे को तुरंत इलाज देने के लिए तैयार किए गए हैं, जिससे कि उनकी जान बचाई जा सके।
अफ्रीकी देश में हुए शोध के आधार पर निकाले गए नंबर
केजीएमयू ने निमोनिया पीड़ित बच्चों के लिए विभिन्न संकेतकों के आधार पर नंबर देने की प्रणाली अफ्रीकी देश में हुए शोध के आधार पर विकसित की है। अफ्रीकी देश में एचआईवी, कुपोषित और अन्य बीमारी से पीड़ित बच्चों पर यह शोध किया गया था। इसी में विभिन्न पैरामीटर के आधार पर नंबर देने की प्रणाली विकसित की गई थी। निमोनिया के लिए इसे ही आधार बनाया गया है।