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मुकदमों को मुल्तवी कराने की प्रवृत्ति छोड़ें वकील : हाईकोर्ट
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मनोज कुमार सिंह
लखनऊ। वकील मुकदमों को मुल्तवी कराने की प्रवृत्ति छोड़ें। जज और वकील रथ के पहिये हैं। न्याय की गति बढ़ाने के लिए वकीलों को रथ का गियर बदलकर और पूरी दक्षता से कोर्ट का सहयोग करना चाहिए। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने व्यापारी नेता बनवारी लाल कंछल से जुड़े 32 साल पुराने मामले में मंगलवार को यह टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने वर्ष 1991 के आपराधिक मामले में कंछल को निचली अदालत से दिए गए दोषसिद्धि के आदेश पर अपील के निस्तारण तक के लिए रोक लगा दी। सरकारी काम में बाधा पहुंचाने, जान माल की धमकी देने के हजरतगंज थाने से संबंधित इस केस में निचली अदालत ने इसी साल कंछल को दोषी करार दिया था। साथ ही दो साल के कारावास व 5000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ कंछल ने सत्र न्यायाधीश लखनऊ के समक्ष अपील की थी। इसके बाद सजा के आदेश पर रोक लगा दी गई थी, लेकिन दोषसिद्धि बरकरार थी। इसपर भी रोक लगाने के आग्रह के साथ कंछल ने अधिवक्ता अमित जायसवाल के माध्यम से यह अर्जी हाईकोर्ट में दाखिल की थी।
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सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि एक अधिवक्ता अन्य अदालत में व्यस्त होने की बात कहकर केस को मुल्तवी कराते रहे। इससे निस्तारण में समय लगा। कोर्ट ने कहा कि अदालतें वकीलों की सुविधा का ध्यान रखती हैं। पर, हम पूरी न्यायिक प्रणाली के बदलते परिदृश्य की अनदेखी नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा, 31 दिसंबर 2020 तक लखनऊ पीठ में फौजदारी के हर तरह के 2,14,410 मुकदमे विचाराधीन थे। न्यायाधीश तो न्याय देने की गति बढ़ाकर लंबित मुकदमों की संख्या कम करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वकीलों के पूरे सहयोग के बगैर वे ऐसा नहीं कर सकते। न्यायरथ को गति देने के लिए वकीलों को भी गियर बदलना चाहिए। (संवाद)
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