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लखनऊ: 90 फीसदी मामलों में बेड की उपलब्धता जाने बिना मरीज हो रहे रेफर, इलाज के लिए धक्के खाने को हैं मजबूर

Thu, 17 Sep 2026 11:39 AM IST
Ishwar Ashish Bhartiya विनीत चतुर्वेदी, अमर उजाला, लखनऊ
विनीत चतुर्वेदी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: Ishwar Ashish Bhartiya Updated Thu, 17 Sep 2026 11:39 AM IST
सार

नियम है कि सरकारी अस्पतालों में पहले मरीज को तत्काल जरूरी इलाज दिया जाए, उसे स्थिर किया जाए और हायर सेंटर में बेड की पुष्टि के बाद ही रेफर किया जाए। लेकिन बिना फोन किए या बेड कन्फर्म किए मरीज को एंबुलेंस में डाल दिया जाता है। इससे मरीज इलाज के लिए धक्के खाने को मजबूर हैं।

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Lucknow: In 90% of cases, patients are being referred without knowing the availability of beds.
- फोटो : amar ujala

विस्तार

गंभीर मरीजों को हायर सेंटर भेजने के लिए रेफरल पॉलिसी तो बनी लेकिन इसे जमीन पर लागू करने वाला ढांचा अब तक खड़ा नहीं हो सका। न हायर सेंटर में बेड की रियल टाइम जानकारी देने वाला मजबूत ऑनलाइन सिस्टम है, न रेफरल की सख्त निगरानी और न ही हर सीएचसी व जिला अस्पताल में गंभीर मरीज को संभालने की समुचित सुविधा।

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जानकारों के मुताबिक, कुछ समय पहले ग्रामीण सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में रेफरल प्रक्रिया पर हुए अध्ययन में सीएचसी, पीएचसी स्तर पर रेफरल से पहले मरीज को स्थिर करने की प्रक्रिया बेहद कम पाई गई, हायर सेंटर से फोन पर समन्वय भी कई जगह नियमित नहीं था। हालात बताते हैं कि करीब 90 फीसदी मामलों में बेड की उपलब्धता जाने बिना 'ब्लाइंड रेफरल' हो रहा है, जबकि 40 से 65 फीसदी मरीजों को स्थानीय स्तर पर जरूरी इलाज दिए बिना ही हायर सेंटर भेज दिया जाता है। अब सुल्तानपुर से लखनऊ रेफर नवजात की मौत के मामले में हाईकोर्ट ने तल्ख रुख अपनाते हुए सरकार से मजबूत ऑनलाइन रेफरल सिस्टम का रोडमैप मांगा है।
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नियम है कि सरकारी अस्पतालों में पहले मरीज को तत्काल जरूरी इलाज दिया जाए, उसे स्थिर किया जाए और हायर सेंटर में बेड की पुष्टि के बाद ही रेफर किया जाए। लेकिन बिना फोन किए या बेड कन्फर्म किए मरीज को एंबुलेंस में डाल दिया जाता है। ऐसे में हर रोज बड़ी संख्या में मरीज अस्पतालों की इमरजेंसी के बाहर धक्के खाने के लिए मजबूर हैं।
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डिजिटल ट्रैकिंग और पोर्टल का अभाव
रेफरल व्यवस्था में तीन बड़ी खामियां सामने आती हैं। पहली, प्रदेश में ऐसा केंद्रीय रियल टाइम डैशबोर्ड नहीं बन सका है, जहां जिला अस्पताल या सीएचसी का डॉक्टर यह देख सके कि लखनऊ या दूसरे मेडिकल कॉलेजों में आईसीयू, वेंटिलेटर या जरूरी विशेषज्ञ की सुविधा है या नहीं। दूसरी, जिला अस्पताल और सीएचसी में कई जरूरी पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी की जांच और विशेषज्ञ सेवाएं 24 घंटे उपलब्ध नहीं रहतीं। मेडिकोलीगल केस या थोड़ी सी भी गंभीर स्थिति में डॉक्टर रिस्क लेने से बचते हैं। तीसरी, रेफरल की नियमित निगरानी और ऑडिट की मजबूत व्यवस्था नहीं है। इससे यह तय करना मुश्किल है कि मरीज को सही वजह से रेफर किया गया या नहीं।

कोविड महामारी के समय लागू हुई थी व्यवस्था

कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान प्रदेश स्तर पर पोर्टल बनाकर मरीजों की भर्ती व्यवस्था दुरुस्त रखने के लिए रेफरल पॉलिसी बनाई गई थी। इससे सभी को यह पता रहता था कि किस अस्पताल में कितने मरीज भर्ती हैं और वहां कितने बेड खाली हैं। गंभीर मरीजों के मामले में भी यह पॉलिसी बनने पर सभी को इलाज मिल सकेगा।

हाईकोर्ट ने रेफरल प्रणाली का मांगा रोडमैप
हाईकोर्ट ने एक नवजात की मृत्यु के मामले में राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि बिना बेड कंफर्म किए गंभीर मरीजों को एक से दूसरे अस्पताल भेजना गैरजिम्मेदाराना रवैया है। कोर्ट ने सरकार से एडवांस लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस बढ़ाने और एक मजबूत ऑनलाइन रेफरल प्रणाली का पूरा रोडमैप तलब किया है।

रेफरल ऑडिट कमेटी बने, जवाबदेही तय हो
केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. प्रेमराज सिंह का कहना है कि रेफरल व्यवस्था सुधारने के लिए तीन स्तरों पर काम जरूरी है। राज्य स्तर पर कंट्रोल रूम बनाकर एंबुलेंस, जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेजों को एक सिस्टम से जोड़ा जाए। हर जिले में रेफरल ऑडिट कमेटी बनाई जाए, जो मरीजों को रेफर करने के कारण और जरूरत की जांच करे। जिला अस्पतालों में क्रिटिकल केयर और जरूरी विशेषज्ञ बढ़ाए जाएं, ताकि मरीजों को बिना जरूरत के बड़े अस्पतालों में रेफर करने की स्थिति में कमी आए।

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