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लखनऊ : हाईकोर्ट ने चार की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला, कहा- प्रत्येक अभियुक्त की भूमिका साफ न होने से मौत की सजा नहीं

Fri, 04 Mar 2022 12:32 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Fri, 04 Mar 2022 12:32 AM IST
सार

28 साल पहले चार लोगों की हत्या के एक मामले में अभियुक्तों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। कोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि चूंकि घटना में दो ऐसे अभियुक्त भी शामिल थे, जिनकी पहचान नहीं हो सकी। साथ ही अभियोजन हर अभियुक्त की भूमिका को स्पष्ट नहीं कर सका है।

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Lucknow: High court commuted the death sentence of four to life imprisonment, saying - no death sentence due to lack of clarity on the role of each accused
लखनऊ हाईकोर्ट

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 28 साल पहले चार लोगों की हत्या के एक मामले में अभियुक्तों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। कोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि चूंकि घटना में दो ऐसे अभियुक्त भी शामिल थे, जिनकी पहचान नहीं हो सकी। साथ ही अभियोजन हर अभियुक्त की भूमिका को स्पष्ट नहीं कर सका है। लिहाजा इसे दुर्लभ से दुर्लभतम मामला नहीं कहा जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने इस मामले में दोषी करार दिए गए चार अभियुक्तों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति विवेक वर्मा की खंडपीठ ने यह निर्णय कृष्ण मुरारी, राघव राम वर्मा, काशी राम वर्मा और राम मिलन वर्मा की ओर से दाखिल अलग-अलग अपीलों पर सुनाया। इन अपीलों के साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील और मामले के वादी की पुनरीक्षण याचिका पर भी सुनवाई कर उन्हें निस्तारित कर दिया।

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हत्या का यह मामला अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) जिले के तारुन थाने का वर्ष 1994 का था। आरोप था कि अपीलार्थियों ने अपने अन्य नकाबपोश साथियों के साथ मिलकर जमीन विवाद में राम देव, राम नरेश, सुखई व गिरीश की हत्या कर दी थी। अपर जिला और सत्र न्यायाधीश फैजाबाद की अदालत ने अपीलार्थियों को दोषी करार देते हुए उनके कृत्य को दुर्लभ से दुर्लभतम मामला करार देते हुए मृत्यु दंड की सजा सुनाई थी। जिसके खिलाफ  ये अपीलें दायर की गई थीं।
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कोर्ट ने कहा दुर्लभ से दुर्लभतम केस नहीं
कोर्ट ने अपीलार्थियों की दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा लेकिन मामले को दुर्लभ से दुर्लभतम नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि मृतकों को घातक चोट पहुंचाने के लिए कौन जिम्मेदार था? वर्तमान अपीलार्थीगण अथवा वे दो या तीन नकाबपोश जिनकी पहचान नहीं हो सकी, यह अभियोजन सिद्ध नहीं कर सका है। इसके अलावा अभियोजन यह भी सिद्ध नहीं कर सका कि अपीलार्थियों ने पूर्व नियोजित तरीके से घटना को अंजाम दिया। कोर्ट ने कहा कि इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि अपराध का उद्देश्य क्या था?

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