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बीहड़ के बागियों को भी खूब भायी सियासी डगर, बंदूक से बात न बनी तो लिया सदन का सहारा

Fri, 12 Apr 2019 04:00 PM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ Published by: Amulya Rastogi Updated Fri, 12 Apr 2019 04:00 PM IST
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lok sabha election 2019 : politics suits well to rebels when gun fails they became politicians
राजनीति
अन्याय के खिलाफ बंदूक उठाकर बीहड़ों में कूदने वालों बागियों को भी सियासी डगर भाती रही है। शोषण, उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ बंदूक के सहारे हर अन्याय का प्रतिकार करने व हर समस्या का समाधान तलाशने का सपना लेकर बीहड़ में कूदे इन लोगों को जब लगा कि बंदूक से हर समस्या का समाधान नहीं हो सकता तो सदन के सहारे सियासत की डगर पकड़ ली।
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कुछ ने सीधे सियासत में आकर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की तो कुछ बागी ऐसे भी हुए जिन्होंने अपने लिए सिर्फ सूत्रधार की ही भूमिका स्वीकार की। खास तौर से चंबल नदी के किनारे बसे इलाकों में इन बागियों के इशारे पर सियासी उलट-फेर होती रही। मलखान सिंह से लेकर फूलन देवी तक ऐसे कई नाम हैं, जिन्होंने सियासत की डगर पकड़ी। सियासी दलों ने भी इन्हें गले लगाने से गुरेज नहीं किया।
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मलखान सिंह

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पूर्व दस्यु सरगना मलखान सिंह - फोटो : अमर उजाला
गांव के सरपंच के जमीन पर कब्जा कर लेने पर जब कहीं से न्याय नहीं मिला तो मलखान सिंह नाम का युवक बीहड़ में कूद पड़ा। पर, जब लगा कि बंदूक के रास्ते का कहीं कोई अंत नहीं है तो 1980 में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के समक्ष आत्मसमर्पण कर बीहड़ का रास्ता छोड़ दिया। 

उस समय उनके ऊपर 32 पुलिस कर्मियों समेत 185 लोगों की हत्या का आरोप था। हालांकि वह खुद को दस्यु के बजाय बागी ही कहते थे और कमजोर शोषित लोगों की मदद के लिए ही पहचाने जाते थे। उन पर कभी महिलाओं के प्रति अत्याचार का मामला दर्ज नहीं हुआ। 

आत्मसमर्पण के बाद मलखान ने पहली बार 1996 में मप्र के ही भिंड के पंचायत चुनाव से सियासत की डगर पर चलना शुरू किया। उन्होंने 2014 केलोस चुनाव में चंबल समेत मप्र केकई इलाकों में भाजपा के लिए प्रचार किया था। 

इस बार शिवपाल सिंह यादव ने उन्हें धौरहरा सीट से प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी बनाया है। इससे पहले भी मलखान मप्र की करैरा विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ चुके हैं।
 

फूलन देवी

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फूलन देवी
बेहमई कांड काफी चर्चित हुआ था। बलात्कार से आहत फूलन देवी ने बंदूक थामी और बीहड़ में कूद पड़ीं। उन्होंने एक साथ 12 ठाकुरों का नरसंहार कर सनसनी फैला दी। वह कई वर्षों तक पुलिस के लिए सिरदर्द बनी रहीं। 1984 में फूलन ने भी मलखान सिंह की तरह मप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह केसमक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। 

इसी बीच 1993 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद मुलायम सिंह यादव ने फूलन पर दर्ज सारे मुकदमे वापस ले लिए और वह जेल से बाहर आ गईं। मुलायम ने उन्हें पहली बार 1996 में मिर्जापुर से लोकसभा का चुनाव लड़ाया।

 वह सांसद बन गईं। हालांकि दो साल बाद हुए मध्यावधि चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। अगले चुनाव में सपा ने उन्हें मिर्जापुर से चुनाव लड़ाकर सांसद बनवा दिया, लेकिन बीच में ही उनकी हत्या हो गई।
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सीमा परिहार

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भाई के साथ सीमा परिहार - फोटो : अमर उजाला
गरीब ठाकुर परिवार में पैदा होने वाली औरैया जिले की 13 वर्षीय सीमा परिहार का बीहड़ के कुख्यात डकैत लाला राम व कुसमा नाईन अपहरण कर चंबल में ले गए थे। डकैतों की कैद से मुक्त कराने के लिए एक साल तक पुलिस का इंतजार करने के बाद सीमा ने खुद को बीहड़ के हवाले ही नहीं किया, बल्कि कुछ ही दिन में आतंक का पर्याय भी बन गईं। 

सीमा पर 40 लाख का इनाम था। करीब 17 साल बाद बीहड़ के जीवन से मोहभंग हुआ तो सीमा ने वर्ष 2000 में आत्मसमर्पण कर दिया। करीब सवा तीन साल बाद जब जेल से बाहर आईं तो खुद के जीवन पर बनी फिल्म ‘वुंडेड’ में भी काम किया। 

इसके बाद शिवसेना के संपर्क में आकर सियासत की ओर रुख किया। 2006 में वह इंडियन जस्टिस पार्टी में शामिल हो गईं। 2007 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में मिर्जापुर-भदोही सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन हार गईं। 2008 में वह कुछ दिन के लिए लोक जनशक्ति पार्टी में शामिल हो गई। अब उन्होंने राजनीति से किनारा कर लिया है।

शिव कुमार उर्फ ददुआ

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सांकेतिक तस्वीर
ददुआ प्रत्यक्ष रूप से राजनीति के रास्ते पर तो नहीं चला, लेकिन अपने भाई, भतीजे व बेटे को राजनीति में उतारने में जरूर सफल रहा। ददुआ ने सबसे पहले अपने भाई बाल कुमार पटेल को बसपा के जरिये राजनीति में ही लॉन्च नहीं कराया बल्कि मेजा विस सीट से टिकट दिलाकर चुनाव भी लड़वाया। 

हालांकि बाल कुमार हार गए। इसके बाद ददुआ की ही मदद से बाल कुमार ने सपा में भी पैठ बना ली और 2009 में मिर्जापुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़कर सांसद बन गए। इस बार भी बाल कुमार बांदा से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे लेकिन अखिलेश यादव ने उन्हें टिकट देने से मना कर दिया।

इसके बाद वह सपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए। कांग्रेस ने बाल कुमार को मिर्जापुर से मैदान में उतारा है।
 
बेटा व भतीजा भी विधायक बने
दुर्दांत ददुआ के नाम का डंका जितना बीहड़ में बजता था, उससे अधिक राजनीति में भी। खास तौर पर मुलायम सिंह से उसके घनिष्ठ संबंधों को लेकर खूब चर्चा भी हुई।

मुलायम से संबंध के ही कारण ददुआ ने अपने बेटे बीर सिंह और बाल कुमार के बेटे राम सिंह को सपा से विधायक बनवाकर अपनी ताकत का एहसास कराया। सपा ने 2012 के विधानसभा चुनाव में राम सिंह को प्रतापगढ़ के पट्टी से और बीर सिंह को चित्रकूट से चुनाव मैदान में उतारा था और दोनों जीत भी गए।
 

कई खुद नहीं लड़े चुनाव, पर खूब की सियासत 

बीहड़ के कई दस्यु सरगना भले ही प्रत्यक्ष रूप से चुनावी राजनीति में न उतरे, लेकिन कई दलों के लिए सियासत खूब की। इनमें मनोहर सिंह गुर्जर, पानसिंह तोमर, प्रेम सिंह, बबली कोल, लवलेश कोल, अंबिका पटेल उर्फ ठोकिया जैसे खूंखार डकैतों का नाम लिया जा सकता है। 

इनका मप्र के अलावा यूपी के भी बुंदेलखंड क्षेत्र में खासा प्रभाव रहा है। कहा जाता है कि एक समय ऐसा भी था जब बुंदेलखंड में चुनाव जीतना दस्युओं के फतवे पर ही निर्भर करता था। इसलिए राजनीतिक दल भी इनके प्रभाव का इस्तेमाल करने में गुरेज नहीं रखते थे। 
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