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गर्भाशय कैंसर में नई उम्मीद: जान तो बचेगी ही... मां बनने का सपना भी रहेगा जिंदा; छोटी सी डिवाइस दिखाएगी कमाल

Mon, 15 Dec 2025 12:08 PM IST
भूपेन्द्र सिंह मनीषा गोस्वामी/संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
मनीषा गोस्वामी/संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ Published by: भूपेन्द्र सिंह Updated Mon, 15 Dec 2025 12:08 PM IST
सार

गर्भाशय कैंसर में नई उम्मीद जगी है। जान बचने के साथ ही मां बनने का सपना भी जिंदा रहेगा। एलएनजी-आईयूएस डिवाइस से गर्भाशय कैंसर की वृद्धि कम की जा सकती है। केजीएमयू में दो महिलाओं का इससे सफल इलाज किया जा चुका है। 

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LNG-IUS device will reduce risk of uterine cancer and enable women to become mothers
गर्भाशय कैंसर (सांकेतिक) - फोटो : Freepik.com

विस्तार

कैंसर का नाम सुनते ही सबसे पहली चिंता जान बचाने की होती है, लेकिन जब यह बीमारी 40 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं को घेरती है, तो इसके साथ मां बनने का सपना भी टूटने लगता है, मगर अब चिकित्सा विज्ञान ने ऐसी महिलाओं के लिए एक नई उम्मीद की राह खोली है, जिसमें जान बचाने के साथ मातृत्व का सपना भी सुरक्षित रह सकता है।

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शुरुआती चरण के एंडोमेट्रियल (गर्भाशय) कैंसर के इलाज में अब टी आकार की छोटी सी एलएनजी-आईयूएस (लेवोनोर्गेस्ट्रेल-रिलीजिंग इंट्रा-यूट्राइन सिस्टम) डिवाइस सर्जरी के विकल्प के रूप में उभर रही है। यह डिवाइस कैंसर की रफ्तार को थामते हुए महिलाओं में गर्भधारण की संभावना बनाए रखने में मदद कर रही है।

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केजीएमयू के स्त्री कैंसर रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. निशा सिंह के अनुसार, एलएनजी-आईयूएस का उपयोग पहले मासिक धर्म की अनियमितता और अत्यधिक रक्तस्राव के इलाज तक सीमित था, लेकिन अब इसे शुरुआती चरण के गर्भाशय कैंसर में फर्टिलिटी प्रिजर्विंग ट्रीटमेंट के रूप में देखा जा रहा है।

डिवाइस की कीमत करीब तीन हजार रुपये है

गर्भाशय कैंसर के मानक इलाज में आमतौर पर हिस्टेरेक्टॉमी के जरिये गर्भाशय को निकालना पड़ता है, जिससे महिला हमेशा के लिए मां बनने की क्षमता खो देती है। लेकिन अब चुने हुए शुरुआती मामलों में यह डिवाइस सर्जरी को टालने का मौका देती है। केजीएमयू में अब तक दो रोगियों में इसका सफल उपयोग किया जा चुका है। खास बात यह है कि यह इलाज बहुत महंगा भी नहीं है। डिवाइस की कीमत करीब 3,000 रुपये है।
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सफलता दर और सीमाएं

डॉ. निशा सिंह बताती हैं कि यह इलाज हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है। यह केवल उन्हीं महिलाओं में किया जा सकता है, जिनमें कैंसर बेहद शुरुआती अवस्था में हो और जो नियमित फॉलोअप के लिए तैयार हों। इस उपचार की मौजूदा सफलता दर करीब 70 प्रतिशत है। यह कैंसर की बढ़त रोक सकता है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं करता। इसकी सफलता दर को बढ़ाने के लिए लगातार शोध जारी हैं।

ऐसे करता है काम

टी आकार की यह डिवाइस छह महीने के लिए गर्भाशय के भीतर रखी जाती है। यह धीरे-धीरे लेवोनोर्गेस्ट्रेल नामक सिंथेटिक हार्मोन छोड़ती है, जिससे गर्भाशय की परत की असामान्य वृद्धि रुकती है और परत पतली होती जाती है। शुरुआती मामलों में इससे कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि धीमी पड़ सकती है या रुक सकती है। इससे तत्काल सर्जरी की जरूरत टल जाती है और इस दौरान मां बनने की इच्छुक महिलाएं आईवीएफ के जरिये गर्भधारण कर सकती हैं।

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