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एलडीए गंभीरता से करता काम तो 75 हजार परिवारों को मिलता आशियाना
Fri, 18 Sep 2020 02:59 PM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Fri, 18 Sep 2020 02:59 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
एलडीए अगर प्रबंध नगर योजना पर गंभीरता से काम करता तो 75 हजार परिवारों को आशियाना नसीब होता। लेकिन 12 साल बाद भी प्राधिकरण यहां काम नहीं कर पाया है। जबकि 203 करोड़ रुपये मुआवजे पर खर्च कर चुका है। यह मुआवजा जिला जज के यहां जमा है।
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इस दौरान निजी बिल्डर यहां तेजी से अवैध कॉलोनियां बसाने में जुटे हैं। जबकि एलडीए जमीन अधिग्रहण में विधिक दिक्कतों का हवाला देकर चुपचाप बैठा है। एलडीए को हरदोई बाईपास पर आईआईएम के नजदीक करीब 1800 एकड़ जमीन में यह आवासीय योजना विकसित करनी है।
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प्राधिकरण ने तीन गांवों की जमीन मुआवजा अवाॅर्ड कर आरक्षित भी कर ली। अधिकारियों की लापरवाही से जमीनों पर कब्जा नहीं लिया जा सका और छह साल तक मुआवजा प्रशासन के पास पड़ा रहा। इसके बाद 2014 में जिला जज के यहां चला गया।
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इससे पहले 2013 में नई अधिग्रहण नीति आने के बाद किसानों ने दोबारा से मुआवजा तय करने की मांग शुरू की। जबकि अफसर पुरानी दरों पर ही मुआवजा देने पर अड़े रहे। इसके चलते करीब 50 याचिकाएं हाईकोर्ट में पड़ी हैं।
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6000 करोड़ रुपये आ सकता है खर्च
अधूरा पड़ा प्रबंध नगर योजना का काम
- फोटो : amar ujala
मुख्य अभियंता इंदुशेखर सिंह ने लैंडपूलिंग और मुआवजा दोनों के आधार पर जमीन अधिग्रहण का प्रस्ताव नए सिरे से दिया है। इसमें छह हजार करोड़ रुपये खर्च आएगा। इसके बावजूद यहां केवल 2500 रुपये प्रति वर्गफीट में जमीन बेचकर एलडीए को 7500 करोड़ रुपये मिलेंगे।
प्रबंधनगर में यहां ली जानी है जमीन
घैला, ककौली और अल्लूनगर डिगरिया गांव।
2008 में एक बार मुआवजा अवॉर्ड हो चुका है। इसकी तकनीकी दिक्कत का आकलन जरूरी है। हाईकोर्ट में भी याचिका पर सुनवाई हो रही है। कोशिश है कि मुआवजा राशि पर सहमति बन जाए। शासन से भी सहमति जरूरी होगी। लैंडपूलिंग के विकल्प पर भी किसानों से बात की जानी है। - पंकज कुमार, प्रभारी अर्जन, एलडीए
प्रबंधनगर में यहां ली जानी है जमीन
घैला, ककौली और अल्लूनगर डिगरिया गांव।
2008 में एक बार मुआवजा अवॉर्ड हो चुका है। इसकी तकनीकी दिक्कत का आकलन जरूरी है। हाईकोर्ट में भी याचिका पर सुनवाई हो रही है। कोशिश है कि मुआवजा राशि पर सहमति बन जाए। शासन से भी सहमति जरूरी होगी। लैंडपूलिंग के विकल्प पर भी किसानों से बात की जानी है। - पंकज कुमार, प्रभारी अर्जन, एलडीए