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Lucknow News: एआई कंपनियों पर कानून और सख्त करने की जरूरत
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लखनऊ विश्वविद्यालय
लखनऊ। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, खासकर जनरेटिव एआई तेजी से हमारे जीवन का हिस्सा बन रही है। इसी बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि एआई कंपनियां जब किताबों, खबरों, लेखों और तस्वीरों से सीखती हैं, तो रचनाकारों के अधिकारों का क्या होगा। इसी विषय पर उप्र राज्य फॉरेंसिक विज्ञान संस्थान और लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि संकाय से जुड़े विद्वानों का एक महत्वपूर्ण शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
शोध में आसान भाषा में बताया गया है कि दुनिया के अलग-अलग देश एआई और कॉपीराइट के मुद्दे को कैसे संभाल रहे हैं। यह शोध-पत्र अटलांटिस प्रेस के स्पि्रंगर नेचर में प्रकाशित किया गया है
शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत को ऐसा नियम बनाना चाहिए, जिससे एआई कंपनियां रचनाकारों से अनुमति लें और उन्हें उचित भुगतान करें। इससे तकनीक भी आगे बढ़ेगी और रचनाकारों का हक भी सुरक्षित रहेगा।
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यूरोप में एआई कंपनियों पर सख्त नियम हैं। वहां उनसे यह बताने को कहा जाता है कि उन्होंने किन जानकारियों का इस्तेमाल किया है। अमेरिका में कानून साफ है कि कॉपीराइट सिर्फ इंसानों की रचनाओं को मिलता है, एआई से बनी चीजों को नहीं। ब्रिटेन में अभी यह तय नहीं हो पाया है कि एआई को प्रशिक्षित करने के लिए कॉपीराइट वाली सामग्री का उपयोग कितना सही है।
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शोध में आसान भाषा में बताया गया है कि दुनिया के अलग-अलग देश एआई और कॉपीराइट के मुद्दे को कैसे संभाल रहे हैं। यह शोध-पत्र अटलांटिस प्रेस के स्पि्रंगर नेचर में प्रकाशित किया गया है
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शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत को ऐसा नियम बनाना चाहिए, जिससे एआई कंपनियां रचनाकारों से अनुमति लें और उन्हें उचित भुगतान करें। इससे तकनीक भी आगे बढ़ेगी और रचनाकारों का हक भी सुरक्षित रहेगा।
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यूरोप में एआई कंपनियों पर सख्त नियम हैं। वहां उनसे यह बताने को कहा जाता है कि उन्होंने किन जानकारियों का इस्तेमाल किया है। अमेरिका में कानून साफ है कि कॉपीराइट सिर्फ इंसानों की रचनाओं को मिलता है, एआई से बनी चीजों को नहीं। ब्रिटेन में अभी यह तय नहीं हो पाया है कि एआई को प्रशिक्षित करने के लिए कॉपीराइट वाली सामग्री का उपयोग कितना सही है।