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Lucknow News: परंपरा के लिए 110 किमी. पैदल चली हथिनी लक्ष्मी
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परंपरा के लिए 110 किमी. पैदल चली हथिनी लक्ष्मी
लखनऊ। वर्षों पुरानी परंपरा को निभाने के लिए हरदोई से 110 किमी पैदल सफर तय कर हथिनी ''लक्ष्मी'' सोमवार को दुबग्गा पहुंच गई। सातवीं मुहर्रम को निकलने वाले ऐतिहासिक शाही मेहंदी जुलूस की शान बढ़ाने के लिए लाई गई लक्ष्मी के स्वागत में अफ्हाम-ए-मजा सोसाइटी के अध्यक्ष सैयद अली मीसम नकवी एडवोकेट, रजनीश धानुक, असीम मार्शल, मोहम्मद अली, जाकिर हुसैन समेत अन्य सदस्य मौजूद रहे।
मंगलवार को सातवीं मुहर्रम पर लक्ष्मी ऐतिहासिक शाही मेहंदी जुलूस में शामिल होगी। यह जुलूस रात नौ बजे बड़ा इमामबाड़ा (आसिफी इमामबाड़ा) से शुरू होकर छोटे इमामबाड़ा (मोहम्मद अली शाह इमामबाड़ा) पहुंचेगा, जहां इसके रात करीब 12 बजे पहुंचने का कार्यक्रम है।
जुलूस की सबसे प्रमुख झलक हाथी पर सवार वह युवक होता है, जो चांदी का अलम लेकर चलता है। यह परंपरा वर्षों से शाही मेहंदी जुलूस का अहम हिस्सा और अकीदतमंदों के आकर्षण का केंद्र रही है। आयोजकों के अनुसार शाही मेहंदी का यह जुलूस हजरत इमाम हुसैन के भतीजे जनाबे कासिम (अ.स.) की याद में वर्षों से निकाला जाता है। मातमी धुनों और पारंपरिक अकीदत के साथ निकलने वाला यह जुलूस लखनऊ की अजादारी की ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
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मुहर्रम की पहली तारीख को निकले शाही जरीह के जुलूस में लक्ष्मी शामिल नहीं हो सकी थी, क्योंकि वह ट्रक पर नहीं चढ़ पाई थी। इसके बाद उसे हरदोई से पैदल पांच दिनों में लखनऊ लाया गया। अब उसके शहर पहुंचने के साथ सातवीं और दसवीं मुहर्रम के जुलूसों में भी लक्ष्मी परंपरा और शान की प्रतीक बनेगी।
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मंगलवार को सातवीं मुहर्रम पर लक्ष्मी ऐतिहासिक शाही मेहंदी जुलूस में शामिल होगी। यह जुलूस रात नौ बजे बड़ा इमामबाड़ा (आसिफी इमामबाड़ा) से शुरू होकर छोटे इमामबाड़ा (मोहम्मद अली शाह इमामबाड़ा) पहुंचेगा, जहां इसके रात करीब 12 बजे पहुंचने का कार्यक्रम है।
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जुलूस की सबसे प्रमुख झलक हाथी पर सवार वह युवक होता है, जो चांदी का अलम लेकर चलता है। यह परंपरा वर्षों से शाही मेहंदी जुलूस का अहम हिस्सा और अकीदतमंदों के आकर्षण का केंद्र रही है। आयोजकों के अनुसार शाही मेहंदी का यह जुलूस हजरत इमाम हुसैन के भतीजे जनाबे कासिम (अ.स.) की याद में वर्षों से निकाला जाता है। मातमी धुनों और पारंपरिक अकीदत के साथ निकलने वाला यह जुलूस लखनऊ की अजादारी की ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
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मुहर्रम की पहली तारीख को निकले शाही जरीह के जुलूस में लक्ष्मी शामिल नहीं हो सकी थी, क्योंकि वह ट्रक पर नहीं चढ़ पाई थी। इसके बाद उसे हरदोई से पैदल पांच दिनों में लखनऊ लाया गया। अब उसके शहर पहुंचने के साथ सातवीं और दसवीं मुहर्रम के जुलूसों में भी लक्ष्मी परंपरा और शान की प्रतीक बनेगी।