पांव में छाले, पेट खाली, 12 दिन में पटियाला से पैदल लखनऊ पहुंचे युवकों का दर्द
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पटियाला में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले सुल्तानपुर के शिवा, सचिन और विवेक मंगलवार को जब लखनऊ पहुंचे तो उनकी आंखों में आंसू और पांव में छाले थे। पैसे खर्च हो चुके थे, पेट खाली था। भूखे होने की वजह से उनके मुंह से आवाज तक नहीं निकल रही थी। 10 दिन से मोबाइल भी स्विच ऑफ था जिससे परिजनों से बातचीत भी नहीं हो पा रही थी।
स्थानीय लोगों ने सहयोग कर उन्हें भोजन कराया और उनके सुल्तानपुर जाने की व्यवस्था भी करवाई। लखनऊ पहुंचकर सड़क किनारे एक जगह थककर बैठे शिवा, सचिन और विवेक ने बताया कि वे सुल्तानपुर जिले के रहने वाले और पटियाला में मथुरा कॉलोनी में रहते थे।
तीनों वहां दिहाड़ी मजदूर थे। रोज जो कमाते थे, उसी से राशन लाते और चार पैसे बचाकर परिवार को भेजते थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद काम बंद हो गया। 14 अप्रैल तक किसी तरह से काम चलाया, लेकिन जब लॉकडाउन बढ़ा तो भूखों मरने की नौबत आ गई।
उन्होंने बताया कि जब कुछ भी समझ में नहीं आया तो तीनों 16 अप्रैल को पटियाला से पैदल ही निकल पड़े। पिछले 12 दिन से लगातार यात्रा कर रहे थे। कहीं कुछ मिल गया तो खा लिया तो कहीं ज्यादा रात हो गई तो वहीं सड़क किनारे कहीं थोड़ी देर के लिए झपकी ले ली।
सुबह से पेट में एक निवाला तक नहीं गया था
आज जब तीनों तेलीबाग पहुंचे तो उनकी आवाज तक नहीं निकल रही थी क्योंकि सुबह से पेट में निवाला भी नहीं गया था। कहीं कुछ मिला ही नहीं तो थककर सड़क किनारे बैठ गए और बोले, हमें सुल्तानपुर जाना है। बस किसी तरह घर मिल जाए।
शिवा ने बताया पिछले 10 दिनों से उन तीनों का मोबाइल स्विच ऑफ था। कहीं चार्ज करने का मौका नहीं मिला। घरवाले भी पता नहीं किस चिंता में होंगे। आसपास के लोगों ने उन्हें भोजन कराया। तीनों की हालत देख वहां मौजूद हर व्यक्ति भावुक था। पैरों में फफोले देख कोई पत्थर दिल भी पिघल जाता।
लोगों ने तीनों को सुल्तानपुर जाने की व्यवस्था कराकर भोजन के पैकेट भी दिए। तीनों का कहना था कि घर में रहकर नमक-रोटी खा लेंगे मगर इतनी दूर मजदूरी करने नहीं जाएंगे। बोले, ईश्वर कभी किसी को ऐसे दिन न दिखाए।