घटता गया कुमार का विश्वास, रहे नंबर चार
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कुमार विश्वास ने अपने बयानों से जनता में भ्रम पैदा कर दिया, कांग्रेस के विरोध में वह भाजपा को बेहतर बताने लगे। जिससे वह अपने लिए ही जनता में अविश्वास पैदा करने लगे।
अपनी कविताओं के दम पर देश-विदेश में धमक बनाने वाले कुमार विश्वास सियासत की पहली पारी में ही अमेठी की पिच पर हिट विकेट हो गए।
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच वे मैदान में उतरे जरूर लेकिन समय के साथ लोगों का विश्वास टूटता गया। नतीजा यह हुआ कि विपक्षियों ने बाजी मार ली।
अमेठी में चुनाव प्रचार के दौरान कुमार विश्वास अपने जिन बयानों को अपनी साफगोई और आक्रामकता समझ रहे थे वही उनकी बड़ी शिकस्त की वजह बन गए।
बयानों से ही पैदा किया भ्रम
चार महीने पहले 12 जनवरी को कुमार विश्वास पहली बार अमेठी पहुंचे तो जनता ने उन्हें हाथों-हाथ लिया था। कांग्रेसियों ने उनका विरोध जरूर किया लेकिन उसकी सहानुभूति भी उन्हीं के खाते में गई।
सब ठीक चल रहा था। जनता उनमें राहुल गांधी का विकल्प देखने लगी थी। तभी उनका जादू कम होने लगा। इसकी वजह अनायास नहीं थी।
काफी हद तक कुमार विश्वास की बयानबाजी और हरकतें इसके लिए जिम्मेदार बनीं। कुमार विश्वास ने पहले आरएसएस को अनुशासित संगठन बताया।
फिर पूर्व में भाजपा को वोट देने की बात कहते हुए कांग्रेस की तुलना में बीजेपी को बेहतर बता दिया। उनके इस तरह के बयान ने खासतौर पर उन लोगों के मन में कड़वाहट पैदा कर दी जो भाजपा को नापसंद करते हुए कुमार विश्वास में राहुल गांधी का विकल्प देखने लगे थे।
बूथ स्तर पर नहीं थे कार्यकर्ता
प्रचार के दौरान कुमार विश्वास ने कांग्रेस के छुटभैया नेताओं से होने वाली नोक-झोंक को कुछ ज्यादा ही तूल पकड़ाने की कोशिश की। जनता में इसका मैसेज ठीक नहीं गया।
लोगों में कुमार विश्वास की छवि नॉन सीरियस कैंडिडेट की बनने लगी। एक कांग्रेसी के बयान पर प्रियंका वाड्रा के खिलाफ केस दर्ज कराने की जिद से लोगों की इस सोच को और बल मिला।
कुमार विश्वास बूथ स्तर पर स्थानीय लोगों की टीम नहीं तैयार कर सके। उनकी टीम में ज्यादातर लोग बाहरी थे।
स्थानीय परिवेश की कम समझ होने के कारण उनकी टीम के लोग यह समझने में नाकाम रहे कि किस क्रिया की समाज में क्या प्रतिक्रिया होगी।
भारी पड़ी स्मृति ईरानी
यही कारण है कि जब भाजपा ने स्मृति ईरानी को मैदान में उतारा तो राहुल का विकल्प तलाश रहे लोगों में वहां भरोसा ज्यादा दिखा।
दूसरी तरफ भाजपा और कांग्रेस दोनों को नापसंद करने वालों ने मजबूरी में राहुल के साथ रहना कहीं बेहतर समझा। दरअसल कुमार विश्वास यह समझ ही नहीं पाए कि सियासत में बेबाकी और बेलौस अंदाज के बजाए येन-केन प्रकारेण जनसमर्थन ही अहम होता है।
कुमार विश्वास की हार की चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि वह चुनाव से चार महीने पहले ही अमेठी में आ डटे थे लेकिन फिर भी उन्हें मात्र 25,527 वोट मिले।
गौरतलब है कि कुमार के लिए अमेठी में प्रचार करने अरविंद केजरीवाल भी गए थे। नतीजे आने तक मुकाबला त्रिकोणीय माना जा रहा था।