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पार्षदों को मिला कोटा, तीस लाख आबादी की सुविधाओं पर चली कैंची
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अब जलकल में भी षार्षदों को दो लाख का कोटा, लेकिन 30 लाख की आबादी की सुविधाआें पर चली कैंची
नगर निगम की तरह अब जलकल में भी पार्षदों को कोटा मिलेगा। हर पार्षद को दो-दो लाख रुपये का कोटा मिलेगा।
हालांकि, शहर की 30 लाख की आबादी के पेयजल आपूर्ति पर खर्च होने वाले बजट पर कैंची चला दी गई। कोटे के लिए पेयजल शोधन पर खर्च होने वाले बजट को भी कम कर दिया गया।
नगर निगम के इतिहास में यह पहला मौका है जब जलकल के बजट में पार्षदों को कोटा दिया गया और पेयजल सुुविधाओं की मरम्मत पर खर्च होने वाले बजट को कम किया गया है।
कर्मचारियों के बकाया देयकों व अवकाश मानदेय के बजट में भी कटौती की गई है। जलकल के बजट में अब तक पार्षदों को कोई कोटा नहीं था।
सिर्फ नगर निगम में ही यह दिया जाता था, पर इस बार वित्तीय वर्ष 2019-20 के जलकल के बजट में पार्षदों को दो लाख रुपये का कोटा मिल गया है। इससे पहले से कर्ज में चल रहे जलकल पर 2.20 करोड़ का बोझ बढ़ गया है।
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अब पार्षद मैनहोल व सीवर, पेयजल की पाइप लाइन में लीकेज की मरम्मत व अन्य जरूरी काम करा सकेंगे। इस कोटे की भरपाई को कई खर्चों में कटौती की गई है।
कोटे को लेकर सदन में सभी दलों के पार्षदों ने कहा कि मैनहोल के ढक्कन लगवाने में समस्या होती है। कांग्रेस की ममता चौधरी ने तो मैनहोल की मरम्मत की पूरी विधि ही बता डाली।
भाजपा के रामकृष्ण यादव ने कोटे का प्रस्ताव रखा, जिसे महापौर ने भी पास कर दिया। जानकारों ने बताया कि कोटा पास कराने को लेकर ही जलकल का सदन अलग से बुलाया गया।
कोटे के लिए घाटा कम करने का दिखावा
पार्षद कोटे केे लिए करीब 22 करोड़ रुपये के घाटे वाले बजट की आय में बढ़ोत्तरी की बजाए खर्चों में कटौती कर कागज पर 9.50 करोड़ किया गया है। जो आय के प्रावधान किए गए थे, उनमें कोई वृद्धि नहीं की गई है। ऐसे में कोटे की प्रथा शुरू होने से जलकल पर बोझ बढ़ेगा। जानकार तो यह भी कहते हैं कि यह तो शुरुआत हुई है, आगे नगर निगम की तरह जलकल में भी यह कोटा हर साल बढ़ेगा। नगर निगम में कोटा पांच सालों में करीब दोगुना होकर 95 लाख रुपये सालाना हो गया है। कोटे के कारण ही निगम पर करीब 300 करोड़ की देनदारी है।
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नगर निगम की तरह अब जलकल में भी पार्षदों को कोटा मिलेगा। हर पार्षद को दो-दो लाख रुपये का कोटा मिलेगा।
हालांकि, शहर की 30 लाख की आबादी के पेयजल आपूर्ति पर खर्च होने वाले बजट पर कैंची चला दी गई। कोटे के लिए पेयजल शोधन पर खर्च होने वाले बजट को भी कम कर दिया गया।
नगर निगम के इतिहास में यह पहला मौका है जब जलकल के बजट में पार्षदों को कोटा दिया गया और पेयजल सुुविधाओं की मरम्मत पर खर्च होने वाले बजट को कम किया गया है।
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कर्मचारियों के बकाया देयकों व अवकाश मानदेय के बजट में भी कटौती की गई है। जलकल के बजट में अब तक पार्षदों को कोई कोटा नहीं था।
सिर्फ नगर निगम में ही यह दिया जाता था, पर इस बार वित्तीय वर्ष 2019-20 के जलकल के बजट में पार्षदों को दो लाख रुपये का कोटा मिल गया है। इससे पहले से कर्ज में चल रहे जलकल पर 2.20 करोड़ का बोझ बढ़ गया है।
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अब पार्षद मैनहोल व सीवर, पेयजल की पाइप लाइन में लीकेज की मरम्मत व अन्य जरूरी काम करा सकेंगे। इस कोटे की भरपाई को कई खर्चों में कटौती की गई है।
कोटे को लेकर सदन में सभी दलों के पार्षदों ने कहा कि मैनहोल के ढक्कन लगवाने में समस्या होती है। कांग्रेस की ममता चौधरी ने तो मैनहोल की मरम्मत की पूरी विधि ही बता डाली।
भाजपा के रामकृष्ण यादव ने कोटे का प्रस्ताव रखा, जिसे महापौर ने भी पास कर दिया। जानकारों ने बताया कि कोटा पास कराने को लेकर ही जलकल का सदन अलग से बुलाया गया।
कोटे के लिए घाटा कम करने का दिखावा
पार्षद कोटे केे लिए करीब 22 करोड़ रुपये के घाटे वाले बजट की आय में बढ़ोत्तरी की बजाए खर्चों में कटौती कर कागज पर 9.50 करोड़ किया गया है। जो आय के प्रावधान किए गए थे, उनमें कोई वृद्धि नहीं की गई है। ऐसे में कोटे की प्रथा शुरू होने से जलकल पर बोझ बढ़ेगा। जानकार तो यह भी कहते हैं कि यह तो शुरुआत हुई है, आगे नगर निगम की तरह जलकल में भी यह कोटा हर साल बढ़ेगा। नगर निगम में कोटा पांच सालों में करीब दोगुना होकर 95 लाख रुपये सालाना हो गया है। कोटे के कारण ही निगम पर करीब 300 करोड़ की देनदारी है।