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जब भारत रत्न मिलने पर दुखी हो गए थे राजर्षि टंडन, पढ़ें ये वाक्या

Sat, 11 May 2019 04:38 PM IST
ishwar ashish अखिलेश बाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश बाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sat, 11 May 2019 04:38 PM IST
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know about rajarshi purushottam das tandon
राजर्षि दास टंडन
राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन प्रदेश विधानसभा के प्रथम अध्यक्ष थे। वह हिंदी के अनन्य उपासक थे। विधानसभा में हिंदी का चलन उनके कार्यकाल में ही शुरू हुआ। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी टंडन को राजर्षि की उपाधि ब्रह्मर्षि देवरहा बाबा ने दी थी।
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वह कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे परंतु कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान की वजहों से राजर्षि टंडन बहुत दिन कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं रहे और त्यागपत्र दे दिया। समझौतावादी रवैया उन्हें एकदम स्वीकार नहीं था। बड़े हिंदी साहित्यकार वियोगी हरि ने अपने संस्मरण में लिखा है, ‘राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन को उनकी सेवाओं के लिए ‘भारत रत्न’ देने की घोषणा हुई।
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वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार और कवि सुमित्रानंदन पंत को ‘पद्म भूषण’ दिया गया। कोई और होता तो वह इस उपलब्धि पर इतराता घूमता। ढिंढोरा पीटता। पर, राजर्षि टंडन तो अलग ही मिट्टी के बने थे। उन्हें अपने भारत रत्न मिलने की उतनी खुशी नहीं थी जितनी पंत जी को ‘भारत रत्न’ न मिलने का दुख।
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दुखी होने पर लिख देते थे पत्र

वह जब दुखी होते थे तो मुझे पत्र लिख देते थे। इस बारे में उन्होंने मुझे पत्र लिखा, ‘भारत सरकार की यह उतार-चढ़ाव वाली उपाधियां देना मुझे पसंद नहीं। मुझे ‘भारत रत्न’ और सुमित्रानंदन पंत को ‘पद्मभूषण।’ यह ठीक है कि उम्र में मैं बड़ा हूं। मैैने भी काम किए हैं।

पर, आगे चलकर लोग पुरुषोत्तम दास टंडन को भूल जाएंगे लेकिन पंत जी की कविताएं तो हमेशा अमर रहेंगी। उनकी कविताएं लोगों की जुबान पर जिंदा रहेंगी। उनका काम मुझसे ज्यादा स्थायी है। इसलिए सुमित्रानंदन पंत को ‘भारत रत्न’ मिलना चाहिए।’ ऐसे थे राजर्षि टंडन।

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