नखलऊवा पंचः जिस क्रांतिकारी की रिहाई को अंग्रेज गवर्नर से भिड़ गए रफी
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रफी अहमद किदवई जेल में बंद थे। उन्हें पता चला कि लखनऊ में अंग्रेजों की गोली से क्रांतिकारी शिवकुमार द्विवेदी का एक पैर खराब हो गया है। वह लंगड़ाकर चलते हैं। पर, अंग्रेज उन्हें पकड़ नहीं पा रहे हैं। किदवई की 1945 में जेल से रिहाई हुई। वह लखनऊ आए और द्विवेदी को मिलने का आग्रह भिजवाया।
स्थान तय हुआ मेडिकल कॉंलेज के डॉ. वीरभान भाटिया का न्यू हैदराबाद स्थित बंगला। सब डर रहे थ। पर, द्विवेदी का तर्क था कि सीआईडी दफ्तर के बगल होने से यह स्थान मुलाकात को ज्यादा सुरक्षित है। ‘क्रांति आंदोलन : कुछ अधखुले पन्ने’ के संस्मरण से पता चलता है, ‘सूर्यास्त के समय एक मौलाना की साइकिल डॉ. भाटिया के बंगले के सामने रुकी। चपरासी ने नाम पूछा।
मौलाना नाम की चिट अंदर भिजवाने के बहाने बरामदे में पहुंच गए। चपरासी जैसे ही कागज व पेंसिल लेने अंदर गया, वैसे ही द्विवेदी भी अंदर पहुंच गए। रफी और डॉ. भाटिया की नजर मौलाना पर पड़ी तो वह चौंक गए। इसी बीच मौलाना मुस्कराए तो रफी समझ गए कि मौलाना के वेश में द्विवेदी ही हैं।
रिहा करवाकर ही माने
दोनों ने खूब बातें की और फिर मौलाना के रूप में द्विवेदी लौट गए। कुछ दिन बाद उनकी गिरफ्तारी हो गई। उन्हें अहमदनगर में नजरबंद कर दिया गया। वर्ष 1946 में प्रदेश में कांग्रेस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी तो रफी गृहमंत्री बनाए गए।
उन्होंने द्विवेदी की रिहाई का प्रयास शुरू किया। इसको लेकर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव पन्नालाल और गवर्नर सर मॉरिस हैलट से उनकी काफी खींचतान हुई। पर, रफी साहब द्विवेदी को रिहा करवाकर ही माने।’