वीआईपी सीटों का हाल: कैराना में पलायन बनाम भाईचारा इस बार भी बड़ा मुद्दा, जनता बोली- जाति-धर्म ही हावी
यूपी की कैराना विधानसभा सीट पर इस बार भी पलायन का मुद्दा ही छाया हुआ है। अब इस बार को मतदाता भी खुलकर बोलने लगे हैं। भाजपा ने मृगांका सिंह को तो सपा ने नाहिद हसन को प्रत्याशी बनाया है।
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चुनावी गाड़ी सरपट दौड़ पड़ी है। मुद्दे एक-एक कर पीछे छूटते जा रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे सड़क किनारे के दरख्त। इन दरख्तों की अपनी अहमियत है। अपना वजूद है। पर, वे मंजिल नहीं। मंजिल तो कहीं और है। याद कीजिए, दो महीने पहले का माहौल। विकास की खूब चर्चाएं थीं। वादे थे...। इरादे थे...। लोगों में भी सवाल थे। ...और अब? अब तो जातियां हैं। जातियों के समीकरण हैं। ध्रुवीकरण के चटख होते रंग हैं। सियासी नफा-नुकसान के हिसाब से लामबंदी है। इन बदलावों से सवाल उठता है- क्या ये सियासत का अंतर्द्वंद्व है? क्या ये सियासत का भटकाव है? कतई नहीं। सियासत का तो यही अंदाज है। वो तो अपने ही चिर-परिचित राह पर है।अपने पसंदीदा अखाड़े में है। आज पढ़ें अतरौली, छाता और कैराना वीआईपी सीटों का हाल...।
शास्त्रीय संगीत और ख्याल गायकी की परंपरा के वाहक किराना घराने को देशभर में पहचान देने वाला कैराना क्षेत्र विधानसभा चुनाव में फिर से सुर्खियों में है। फिर से दो सियासी घरानों के चिर-परिचित प्रतिद्वंद्वी मैदान में हैं। विकास और दूसरे मुद्दे इस बार भी यहां गौण हैं। इस बार भी पलायन बनाम भाईचारे की बहस पूरे क्षेत्र में छिड़ी हुई है।
कैराना ही वो सीट है, जहां से 2017 में भाजपा ने पलायन के मुद्दे को हवा दी और उसे कानून-व्यवस्था से जोड़कर सपा सरकार को घेरा था। प्रदेशभर में चुनाव के दौरान इस मुद्दे को उठाया और सरकार बनाई। इस बार भी भाजपा इसी मुद्दे को हवा दे रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय यहां से हुए पलायन को मुद्दा बनाया गया था, तो इस बार पलायन पीड़ितों के लौटकर आने को मुद्दा बना कर ध्रुवीकरण की कोशिश हो रही है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कैराना में भाजपा प्रत्याशी के लिए घर-घर जाकर वोट मांगे और पलायन पीड़ितों से भी मिले। इससे पहले गत वर्ष नवंबर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पलायन पीड़ितों से मिले थे। भाजपा के इस मुद्दे की काट के लिए रालोद-सपा गठबंधन के प्रचार का फोकस आपसी भाईचारे पर है। भाजपा और गठबंधन के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का सवाल बन गई है।
ये हैं मैदान में : सपा-रालोद गठबंधन से वर्तमान विधायक नाहिद हसन सपा के टिकट पर प्रत्याशी हैं। नामांकन के अगले ही दिन उन्हें गिरोहबंद अधिनियम के एक मामले में जेल भेज दिया गया। फिलहाल वह जेल में हैं और उनकी छोटी बहन इकरा हसन उनके चुनाव की कमान संभाल रही हैं। भाजपा ने मृगांका सिंह को फिर से चुनावी मैदान में उतारा है। बसपा ने राजेंद्र सिंह उपाध्याय और कांग्रेस ने अखलाक को टिकट दिया है। आम आदमी पार्टी से संगीता चुनाव मैदान में हैं।
मतदाता बोले-चुनाव में जाति-धर्म ही हावी
चौक बाजार निवासी अमन गुप्ता बताते हैं कि भाजपा सरकार आने के बाद से कानून-व्यवस्था सुधरी है। अपराध में कमी आई है। विकास कार्य भी हुए हैं। कैराना के विकास पर काफी ध्यान दिया गया है। पहले यहां कारोबार करना भी मुश्किल था। अब व्यापारी बेखौफ अपना कारोबार करते हैं। जामा मस्जिद निवासी राशिद का कहना है कि यहां हिंदू-मुस्लिम हमेशा से मिल-जुलकर रहते आ रहे हैं। पहले के मुकाबले आपराधिक घटनाएं कम हुई हैं ये तो हम भी मानते हैं। पर, पलायन जैसी कोई बात नहीं है। इस मुद्दे को जानबूझकर हवा दी गई। बड़ी संख्या में यहां के लोग कारोबार के सिलसिले में बाहर रहते हैं। इसे पलायन नहीं कहा जा सकता। कांधला तिराहा पर मिले शमीम बताते हैं कि चुनाव में पिछली बार की तरह धर्म और जाति के आधार पर ही मतदान होगा। वे कहते हैं, अन्य मुद्दे इस बार भी यहां गौण हो जाएंगे।
दो घरानों के बीच सियासी अदावत
कैराना सीट पर लंबे अरसे से पूर्व सांसद स्व. बाबू हुकुम सिंह और मुनव्वर हसन के परिवार की सियासी अदावत चली आ रही है। इसमें कभी एक परिवार तो कभी दूसरा भारी पड़ता रहा है। इन दोनों के बाद अब अगली पीढ़ी इस सियासी अदावत को पूरी शिद्दत के साथ निभा रही है। 2014 में बाबू हुकुम सिंह यहां से सांसद चुने गए थे। उनके निधन से रिक्त हुई सीट पर उपचुनाव में सपा-रालोद गठबंधन प्रत्याशी तबस्सुम हसन ने जीत हासिल की थी। 2017 के विधानसभा के चुनाव में उनके बेटे नाहिद हसन ने जीत दर्ज की थी। चौंकाने वाली बात यह थी कि कैराना पलायन के मुद्दे को प्रदेश भर में उठाने वाली भाजपा यहीं पर चुनाव हार गई थी।
2017 का चुनाव परिणाम
नाहिद हसन -- सपा -- 98,830
मृगांका सिंह -- भाजपा -- 77,668
अनिल चौहान -- रालोद -- 19,992
दिवाकर देशवाल -- बसपा -- 6,888