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पतंगबाजी: बड़े किस्से हैं इस नफासती खेल के

Mon, 05 Aug 2013 11:19 AM IST
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क Updated Mon, 05 Aug 2013 11:19 AM IST
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माना जाता है कि पतंग जो कि एक हजार बरस पहले से चीन में मन बहलाव का जरिया रही है।

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धीरे-धीरे हिंदुस्तान पहुंची लेकिन जानकारों कहना है कि भारत में आकाशदीप परम्परा से पतंग का जन्म हुआ है। प्राचीन कवियों ने भी पतंग की बात कविताओं में कही है, हालांकि तब तक पतंग को ये नाम नहीं मिला था।

तब इसे गुडी या चंग कहा जाता था। नवाब असाफुद्दौला के शासन काल में पतंग की परवरिश खूब हुई। वह अपने शीशमहल की छत से पतंग उड़ाया करते थे लेकिन पतंग लड़ाने का सिलसिला सन् 1800 से नवाब सआदत अली खां के अहद से शुरू हुआ।
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फिर धीरे-धीरे तमाम खेलों और बाजियों में पतंगबाजी का सिक्का कायम हो गया यहां कनकव्वे से नौ पेंच काटने वाले को नौशेखां की उपाधि से विभूषित किया जाता था।
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बादशाह अमजद अली शाह के दौरे हुकूमत में मुर्शिदाबादी बांस मंगा कर पतंग के ठड्डे और धनुष बनाए जाने लगे। मीर अम्दू, ख्वाजा मिट्ठन और शैखइमदाद इस जमाने के जबरदस्त पतंगबाज हुए हैं।

जाने आलम के समय में तो पतंग अपने पूरे शबाब पर पहुंच गई। ऐसी जानकारी मिलती है कि नवाब वाजिद अली शाह चौक में मछली वाली बारादरी की छत से पेंच लड़ाया करते थे।

दुल्हन की तरह सजती थी पतंगें
नवाबी की पतंगें दुल्हन की तरह सजी सजायी होती थी जिनमें अक्सर सोने और चांदी के तारों की झलझली बंधी होती थी। ये पतंगे जिसकी छत पर कट कर गिरती थीं उसके घर उस दिन पुलाव बनता था।

सन् 1857 में लखनऊ रेजीडेंसी के ब्रिटिश अधिकारियों ने एक पतंग के द्वारा अपना गुप्त्ा संदेश किला मच्छी भवन तक पहुंचाने में सफलता पाई थी। लखनऊ में दीवाली के दूसरे दिन होने वाला जमघट त्योहार पतंग के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। इस दिन पतंग से लखनऊ का आसमान रंगीन समंदर हो जाता है।

ये हैं पुराने अड्डे
वजीरबाग, डालीगंज, चौक ये कुछ ऐसे अड्डे हैं जहां आपको हर तरह के पतंग जैसे तावा, ढाया, तीन, चार पौनताई बनचों और पैसुल्ची मिल जाएंगे। लखनऊ में पतंग के टूर्नामेंट भी होते रहे हैं जिसमें बढ़-चढ़कर लोग हिस्सा लेते रहे हैं।


लखनऊ की पतंगबाजी इसलिए भी अलग मानी जाती है क्योंकि यहां तवायफों ने भी पतंगबाजी का हुनर दिखाया है। इतिहासकार योगेश प्रवीण बताते हैं कि नक्खास की जली खुर्शीद बहुत लंबे पेंच लड़ाती थीं।

भले ही लखनऊ आधुनकिता के रंग में जीने लगा है लेकिन यहां के लोगों का इस पुरानी रवायत से मोह आज भी बरकरार है।

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