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केजीएमयू के अध्ययन में खुलासाः नींद की बीमारी से बढ़ रहे सड़क हादसे, जानें- क्या है स्लीप एप्निया

Wed, 17 Jul 2019 03:30 PM IST
ishwar ashish चंद्रभान यादव/अमर उजाला, लखनऊ
चंद्रभान यादव/अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Wed, 17 Jul 2019 03:30 PM IST
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KGMU study on road accidents in uttar pradesh
स्लीप एप्निया

स्लीप एप्निया (नींद की बीमारी) से पीड़ित वाहन चालक सड़क हादसे और ऐसे खतरों को बढ़ा रहे हैं। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के डॉक्टरों की टीम के अध्ययन में सामने आया कि ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने वाले करीब 23 फीसदी लोग इस बीमारी के शिकार हैं।

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स्लीप एप्निया की वजह से एकाग्रता टूटती है और दुर्घटनाएं होती हैं। अध्ययन में ये भी कहा गया कि ड्राइविंग लाइसेंस बनाते समय इन्हें चिह्नित कर हादसों को रोका जा सकता है।
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क्या है स्लीप एप्निया
स्लीप एप्निया निद्रा से जुड़ी गंभीर समस्या है। केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन के विभागाध्यक्ष प्रो. सूर्यकांत इसकी गंभीरता को लेकर बताते हैं कि इस बीमारी में सोते समय 10 सेकंड तक के लिए सांस रुक जाती है।  इससे रक्त में ऑक्सीजन का स्तर गिरता है और कुछ सेकंड के लिए मष्तिस्क मांसपेशियों को संकेत देने में विफल हो जाता है। यानी मस्तिष्क शून्य जैसा हो जाता है।

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यहां देखें- कब होती है ज्यादा समस्या

KGMU study on road accidents in uttar pradesh
बस ड्राइवर - फोटो : अमर उजाला

इसके कई रूप
ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया:  यह सबसे सामान्य प्रकार हैं। यह तब होता है जब नींद में गले की मांसपेशियों की शिथिलता के चलते श्वसनमार्ग आंशिक या पूर्ण रूप से अवरुद्ध होने लगता है, इससे अक्सर लोग जोर से खर्राटे लेते हैं।

सेंट्रल स्लीप एप्निया: ये कम पाया जाता है। इसमें मस्तिष्क सांस लेने को नियंत्रित करने वाली मांसपेशियों को संकेत देने में विफल रहता है। इससे ग्रस्त लोग भी खर्राटे लेते हैं। इसमें सेंट्रल नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है।

कॉम्प्लेक्स स्लीप एप्निया: यह ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया और सेंट्रल स्लीप एप्निया का मिला-जुला रूप होता है।

कब होती है ज्यादा समस्या
ऐसा रात में कई बार होता है। सुबह के वक्त ज्यादा यह समस्या ज्यादा होती है

देखें- ये रहे अध्ययन में शामिल

KGMU study on road accidents in uttar pradesh
प्रतीकात्मक तस्वीर

कैसे जानें कि स्लीप एप्निया के शिकार हो रहे
इसका प्राथमिक लक्षण है जोर से खर्राटे आना, उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक, अनियमित दिल की धड़कन, मधमेह आदि। यह पूरी तरह से उपचार योग्य है। कुछ दवाएं, डिवाइस और अंत में सर्जरी के जरिए इसका इलाज किया जाता है।

ये रहे अध्ययन में शामिल
इस शोध टीम में केजीएमयू रेस्पिरेटरी विभाग के डॉ. अभिषेक दुबे, डॉ. दर्शन बजाज, डॉ. स्वाति दीक्षित शामिल रहे। गाइड के रूप में रेस्पिरेटरी विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्यकांत, और डॉ. बालेंद्र प्रताप सिंह शामिल रहे। इसे यूरोपियन रेस्पिरेटरी जर्नल ने भी प्रकाशित किया है।

मिलीं कई और समस्याएं

KGMU study on road accidents in uttar pradesh
प्रतीकात्मक तस्वीर

ऐसे किया अध्ययन
राजधानी में दो रीजनल ट्रांसपोर्ट आफिस (आरटीओ) हैं। केजीएमयू की टीम ने यहां लाइसेंस बनवाने आए 542 पर अध्ययन किया। ये सभी पुरुष थे और इनकी उम्र 20 से 50 साल के बीच थी। इनके बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई), ब्लड प्रेशर, धूम्रपान, तंबाकू व शराब पीने जैसी आदतों समेत पूरा ब्यौरा तैयार किया गया।  इसके साथ ही खर्राटा लेने, थकान महसूस करने, एप्निया से संबंधित, ब्लड प्रेशर, गर्दन की समस्या, बॉडी मास इंडेक्स के आंकड़े जुटाकर जोखिम का निर्धारण किया गया।

स्लीप एप्निया के साथ ही कई और समस्याएं मिलीं
लाइसेंस बनवाने आए इन लोगों में 23 फीसदी हाई रिस्क वाले पाए गए। यानी ये स्लीप एप्निया से पूरी तरह ग्रसित थे। इसी तरह करीब 40.4 फीसदी ब्लड प्रेशर, 17. 1 फीसदी गर्दन की समस्या से पीड़ित पाए गए, 12.3  फीसदी खर्राटे की समस्या तो 10.5 फीसदी थकान अथवा अनिद्रा के शिकार पाए गए।
 

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