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काव्य संध्या में बही रस धारा
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Mon, 20 Jan 2014 11:34 AM IST
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नन्द निकेतन में रविवार को चेतना साहित्य परिषद की ओर से आयोजित काव्य
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संध्या में कवियों ने रसों की धारा बहाई।
काव्य संध्या में धीरज मिश्र ने ‘दर्द-ए-दिल अशआर की सूरत में जब ढलने लगा’ सुनाया।
इसके बाद प्रमोद द्विवेदी प्रमोद ने राष्ट्रीय चेतना के छन्द ‘वैसे सबकुछ लिखा जाये पर शौर्य गाथा, देश के शहीदों की बखानना जरूरी है’, डॉ. आशुतोष वाजपेयी ने ‘इन्हीं का लगाया गया मूल्य भी धार के ही बड़ा मान पाया गया है, महारानियों के तनों को ढका था, इन्हें आज पोंछा बनाया गया है’ सुनाकर तालियां बटोरीं।
डॉ. दिनेश चन्द्र अवस्थी ने अवधी छन्द ‘सिंहिना की भाँति जौनु-जौनु गरियायों तुम, एक-एक पुरिखा बिना पानी के तरिगा’ और आशिक बरेलवी ने ‘खटखटा खट खुल रही हैं खिड़कियां कैसे कहें, झांकती हैं घर से बाहर लड़कियां कैसे कहें’ सुनाकर वाहवाही लूटी।
काव्य संध्या में धीरज मिश्र ने ‘दर्द-ए-दिल अशआर की सूरत में जब ढलने लगा’ सुनाया।
इसके बाद प्रमोद द्विवेदी प्रमोद ने राष्ट्रीय चेतना के छन्द ‘वैसे सबकुछ लिखा जाये पर शौर्य गाथा, देश के शहीदों की बखानना जरूरी है’, डॉ. आशुतोष वाजपेयी ने ‘इन्हीं का लगाया गया मूल्य भी धार के ही बड़ा मान पाया गया है, महारानियों के तनों को ढका था, इन्हें आज पोंछा बनाया गया है’ सुनाकर तालियां बटोरीं।
डॉ. दिनेश चन्द्र अवस्थी ने अवधी छन्द ‘सिंहिना की भाँति जौनु-जौनु गरियायों तुम, एक-एक पुरिखा बिना पानी के तरिगा’ और आशिक बरेलवी ने ‘खटखटा खट खुल रही हैं खिड़कियां कैसे कहें, झांकती हैं घर से बाहर लड़कियां कैसे कहें’ सुनाकर वाहवाही लूटी।