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लखनवी कथक ताल पर थिरका जमाना
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
Updated Fri, 16 Aug 2013 02:32 PM IST
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लखनऊ को लखनऊ बनाने में यहां की कथक कला को अग्रणी माना जा सकता है। कथक गुरू विक्रम सिंह की मानें तो कथक लखनऊ का गौरव है।
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वह बताते हैं कि लखनऊ में प्राचीन भैरो जी मंदिर के सामने बिन्दादीन महाराज की ड्योढ़ी, कभी भारत के कथक नर्तकों के लिए मक्का जैसी हुआ करती थी। केवल कथक नर्तक या नर्तकियों ही नहीं बड़े-बड़े राजा, नवाब, सेठ, साहूकार इस ड्योढ़ी पर आकर सिर झुकाते थे।
इतिहासकार डॉ. योगेश प्रवीण अपनी किताब आपका लखनऊ में लखनवी कथक के बारे में विधिवत जानकारी देते हैं। कथक में तीन ताल ही मुख्य आधार है जिसके साथ ततकार के बोल निकाले जाते हैं।
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कथक में भी गंगा-जमुनी तहजीब
लखनऊ के मिजाज का नाजो अंदाज, यहां के सलीके, तौर-तरीके, यहां का रहन-सहन, खानपान, यहां की महफिलों और बातचीत में ही नहीं, अवध की ललित कलाओं में भी रचा बसा है। साहित्य और संगीत को भी लखनऊ ने इसी रंग में सराबोर किया है जिसका जलवा कथक के लखनऊ घराने में साफ नजर आता है।
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यहां इस नृत्य कला का रंग भी गंगा-जमुनी है और कथक इसका सबसे शानदार उदाहरण है। ये संगम स्वभाव का नृत्य है जिसमें हिंदू मंदिरों की भावपूर्ण परंपरा और मुगल शैली का सुंदर संगम है, ठीक उसी तरह जैसे कि अवध की दिलकश इमारतों में राजपूती तोरण तथा शाहजहानी महराबें गले मिलती है।
कई सितारे दिए इस सरजमीं ने
कथक में जो नमक बराबर जो नखरा है वो लखनऊ का अपना रंग है। लखनऊ की बिंदादीन महाराज की चौखट से निकलकर शंभू महाराज जैसे अभिनय सम्राट और लच्छू महाराज जैसे रस विज्ञानी सारी दुनिया में सुप्रसिद्ध हुए। इसी घर के आंगन में कभी ठुमुक कर चलने वाले बिरजू महाराज आज विश्व विदित कथक नर्तक हैं।
इलाहाबाद की हंडिया तहसील के मिसिर घराने के कथक पर जो उपकार हैं उन्हें कौन्ा नहीं जानता। श्री ईश्वर प्रसाद मिश्र ने एक स्वप्नादेश के आधार पर नटवरी नृत्य का पुनरुद्धार करने की प्रतिज्ञा की थी। वे अपने तीनों बेटो अड़गूजी, खड़गूजी और तुलाराम जी को आजीवन नृत्य की शिक्षा देते रहे। अड़गूजी के तीन बेटे प्रकाश जी, दयाल जी और हरिलाल जी हुए। इन तीनों ने ही लखनऊ को अपना साधना स्थल बनाया।
कमाल दिखाया तीन की तिकड़ी ने
अठारहवीं सदी के उस दौर में नवाब असाफुद्दौला की हुकूमत थी और प्रदेश के बहुत बड़े भू-भाग में अकाल पड़ गया था। प्रकाश जी नवाब के दरबारी नर्तक बन गए। प्रकाश जी के तीन पुत्र महाराज दुर्गा प्रसाद, महाराज ठाकुर प्रसाद और मानजी उनमें ठाकुर प्रसाद जी, जाने आलम के नृत्य गुरू हुए।
आगे चलकर दुर्गा प्रसाद के भी तीन बेटे हुए- बिंदादीन, कालिका प्रसाद और भैरो प्रसाद। इनमें बिंदादीन महाराज कथक नृत्य के सिरमौर कहे जाते हैं। उन्होंने डेढ़ हजार ठुमरियों की रचना की। अगली पीढ़ी में कालिका प्रसाद के भी तीन बेटे हुए। अच्छन महाराज, लच्छू महाराज और शंभू महाराज।
अच्छन महाराज रामपुर दरबार के नर्तक रहे हैं और उनके बेटे बिरजू महाराज की मशहूरियत किसी से छुपी नहीं है। शंभू महाराज ने दिल्ली में कथक शिक्षा का कारोबार किया वहीं लच्छू महाराज के नृत्य कला में कथक ने कमनीयता पूरे शबाब पर देखी जा सकती थी।
उन्होंने फिल्मों के लिए भी काम किया। अगर वर्तमान में लखनवी घराने की बात की जाए, तो पंडित अर्जुन मिश्र, कपिला राज, मालविका सरकार, कुमकुमधर, कुमकुम आदर्श, सुरेंद्र सैकिया, मंजरी चतुर्वेदी, मनीषा मिश्रा जैसे प्रतिष्ठित कथक कलाकार हैं।