कारगिल युद्घ: पांच के सिक्कों की वजह से बची थी इस सैनिक की जान
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जम्मू कश्मीर के उड़ी इलाके में बीते 18 सितंबर को हुए आतंकी में 18 जवान के शहीद होने के बाद भारत ने करारा जवाब दिया है। पढ़ें कारगिल युद्ध के दौरान एक सैनिक की बहादुरी की दास्तान उन्हीं की जुबानी।
‘मई 1999 का वह दिन आज भी याद है जब अचानक हमें निर्देश मिले कि द्रास क्षेत्र की तरफ बढ़ना है। हमारी टुकड़ी उस तरफ चल दी। 16 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर जहां खून जमा देने वाली ठंड थी। किसी के पास उस मौसम के लिए विशेष कपड़े, जूते व अन्य तैयारी तक नहीं थी, लेकिन हमारे कदम एक पल को नहीं रुके। उस समय मेरी उम्र सिर्फ 19 साल थी। प्रशिक्षण और सेवा मिलाकर मात्र ढाई साल का अनुभव। हां, पहली पोस्टिंग कश्मीर में होने के दौरान साथियों से युद्ध नीति बनाने के बारे में जरूर सीखा था।’
परमवीर चक्र विजेता सूबेदार योगेंद्र सिंह यादव ने इन शब्दों में कारगिल के ऑपरेशन विजय के अनुभव साझा किए तो सभागार में एक अलग ही माहौल बनता गया।
कारगिल युद्ध में अहम किरदार निभाने वाले योगेंद्र बुधवार को एकेटीयू व कलाम सेंटर की ओर से आयोजित इंटरनेशनल यूथ कॉन्क्लेव को संबोधित कर रहे थे।
तीन गोलियां खाने के बाद भी जज्बा नहीं हुआ कम
सूबेदार ने कहा कि 28 मई 1999 को ऑपरेशन विजय शुरू हुआ और 13 जून को पहली सफलता मिली। जब हम अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे थे तो पता चला कि पाकिस्तानी सैनिक ऊंची चोटियों से हमला कर रहे हैं।
रणनीति बनी कि सबसे पहले टाइगर हिल को कब्जे में लिया जाए, लेकिन वहां जाने के लिए 90 डिग्री की सीधी चढ़ाई थी। इसके बावजूद किसी ने हिम्मत नहीं हारी। दो जुलाई को कुछ जवानों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चढ़ाई शुरू की।
दो दिन और तीन रात का सफर तय करके ऊपर पहुंचने ही वाले थे कि दुश्मनों ने फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें कई साथी मारे गए। कुछ ही ऊपर तक पहुंच पाए। ऊपर पाकिस्तानी सेना के बंकर बने थे। हमने सोचा, मरना तो है ही, तो जितने अधिक पाकिस्तानी सैनिकों का खात्मा कर सकें, उतना अच्छा। हमने फायरिंग शुरू कर दी। पांच घंटे तक फायरिंग के बाद हमने नीति बदलते हुए फायरिंग बंद कर दी। दुश्मन को लगा कि हमारा बारूद खत्म हो गया या सभी मारे गए।
'पाकिस्तानी सैनिक हमें देखने आए हमने फायरिंग शुरू कर दी'
सुबह लगभग 11 बजे थे जब पाकिस्तानी सैनिक हमें देखने आए। हम पूरी तरह अलर्ट थे। हमने उन पर फायरिंग शुरू कर दी, लेकिन उनका एक सैनिक बचकर भाग गया और दूसरे सैनिकों को हमारी पूरी जानकारी दे दी।
आधे घंटे के अंदर ही 35-40 पाकिस्तानी सैनिकों ने वहां आकर हमला कर दिया। हमारे महत्वपूर्ण हथियार ध्वस्त हो गए। मेरे सामने दो साथी मारे गए। मैं जमीन पर लेट गया और मरने का दिखावा किया। इसके बाद भी पाकिस्तानी सैनिकों ने मुझ पर गोलियां बरसाईं। एक गोली हाथ में, दूसरी पैर में लगी। मैंने दर्द का घूंट पी लिया, क्योंकि हिलता तो मारा जाता।
मन में बस यही था कि किसी तरह वापस जाकर अपनी सेना को दुश्मनों की पूरी जानकारी दे दूं जिससे उनके लिए नीति बनाना आसान हो। तभी एक पाकिस्तानी सैनिक ने मेरे सीने पर गोली मारी, लेकिन मेरी जेब में एक पर्स था जिसमें पांच-पांच के सिक्के थे, जिन्होंने जान बचा ली। इसके बाद पाकिस्तानी सैनिक लौटने लगे तो मैंने जेब से हैंड ग्रेनेड निकाला और उन पर फेंक कर उनके एक असलहे पर कब्जा कर लिया।
इसके बाद गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। दुश्मनों को खत्म करने के बाद मैंने हिम्मत जुटाई और किसी तरह नीचे लुढ़कते हुए अपने साथियों तक पहुंचा। उसी रात हमारी दूसरी टुकड़ी पूरी तैयारी के साथ ऊपर गई और उनको हराकर तिरंगा लहराया।
पट्टियों की वजह से मां नहीं पहचान सकी
सूबेदार ने कहा कि तीन दिन बाद जब होश आया तो खुद को श्रीनगर के 92 बेस हेडक्वार्टर में पाया। सबसे पहले मां मिलने आई, लेकिन पूरे शरीर पर पट्टियां होने की वजह से पहचान न सकी। 16 महीने इलाज के बाद जब ठीक हुआ तो फिर से सेना को जॉइन कर लिया।
जवान के साथ सेल्फी लेने की होड़
कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में लोग कारगिल युद्ध की इस दास्तां को मोबाइल फोन में रिकॉर्ड करते दिखे। दास्तां खत्म होने के बाद सभी ने अपनी सीट से खड़े होकर सूबेदार योगेंद्र को सम्मान दिया। योगेंद्र जब पंडाल से बाहर आए तो युवाओं में उनके साथ सेल्फी लेने की होड़ मच गई।
भावनाएं हमारी भी हैं, लेकिन टास्क पहले
युवाओं ने सूबेदार योगेंद्र से सवाल भी किए। एक छात्र ने पूछा कि फौजी के जीवन में भावनाओं की क्या अहमियत है? कभी किसी फौजी को रोते नहीं देखा? परमवीर चक्र विजेता ने कहा कि फौजी की भावनाएं भी बाकी लोगों की तरह ही होती हैं।
अंतर बस इतना है कि उसकेलिए टास्क पहले होता है। यदि वह टास्क पूरा नहीं करेगा तो साथियों की शहादत व्यर्थ हो जाएगी। उन्होंने कहा कि देशभक्ति के लिए वर्दी की जरूरत नहीं है। आप जिस क्षेत्र में हैं, उसमें अच्छा करें। दूसरों को सुधारने की जगह खुद को सुधारने पर ध्यान दें।
जब यह सवाल मन में आए कि देश ने हमें क्या दिया तो खुद से पूछें कि हमने देश को क्या दिया? सूबेदार योगेंद्र ने कहा कि हमारी संस्कृति हमारी प्राकृतिक हरियाली है। ये पेड़-पौधे वातावरण को तो बेहतर रखते ही हैं, युद्ध के दौरान हम सैनिकों के लिए इनकी आड़ में दुश्मन पर हमला करना आसान होता है।
यह तो हमारे देश की मिट्टी का असर है
दर्शक दीर्घा में से एक सवाल यह भी आया कि कारगिल युद्ध में सूबेदार योगेंद्र निहत्थे और घायल होने के बाद भी कैसे लड़ते रहे। कभी उनके कदम डिगे क्यों नहीं। इस पर भारत मां के इस लाल ने बस यही कहा-यह तो हमारे देश की मिट्टी का असर है।