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कारगिल के इस सैनिक की शहादत पर परिजनों को फख्र पर इस बात का है दुख

Wed, 26 Jul 2017 03:56 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, रायबरेली
ब्यूरो/अमरउजाला, रायबरेली Updated Wed, 26 Jul 2017 03:56 PM IST
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 kargil diwas special story of raebareli martyr rajendra yadav
शहीद राजेंद्र यादव (फाइल फोटो) - फोटो : amar ujala
रायबरेली जिले से भी एक वीर सपूत ने पाकिस्तानी सेना को धूल चटाई थी। शहीद राजेंद्र यादव ने कारगिल युद्ध के दौरान दुर्गम पहाड़ियों पर देश के लिए जान की बजा लगा दी थी। अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी थी। जीत हासिल होने की बारी आई तो वह भारत माता की आंचल में सदा के लिए सो गया। हालांक‌ि उनके परिवारको उनकी शहादत पर गर्व है लेकिन उनसे प्रशासन ने भरण-पोषण सह‌ित जो भी वादे क‌िए गए थे वो पूरे नहीं हुए जिसका उन्हें दुख है।
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आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें सभी के जेहन में सदैव बनी रहती हैं। डलमऊ तहसील क्षेत्र के एक छोटे से गांव मुतवल्लीपुर में जन्में राजेंद्र यादव ने कारगिल युद्ध में अपनी वीरता का लोहा मनवाया था।
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वर्ष 1984 में थल सेना की कुमाऊं रेजीमेंट में सिपाही से भर्ती हुए राजेंद्र यादव ने अपनी काबिलियत और वीरता के दम पर जल्द ही नायक बना दिए गए थे। कारगिल की तुर्तुब सीमा की चौथी पहाड़ी पर दुश्मनों के मंसूबों को विफल करते हुए शहीद हो गए थे।
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पति को याद करते ही रो पड़ती ललिता

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ल‌ल‌िता देवी - फोटो : amar ujala
शहीद के परिवार के लिए जो वायदे किए गए थे, वह आज पूरे नहीं हो पाए। राजेंद्र की यादों को संजोने के लिए न तो मिनी स्टेडियम बन पाया और न ही मुराईबाग चौराहा पर उनकी मूर्ति लग पाई। जमीन देने की बात कही गई थी, जो पूरी नहीं हो पाई।

ललिता देवी को जहां पति की शदाहत पर गर्व है, वहीं राजेंद्र को याद करते ही रो पड़ती हैं। शहर के राजकीय कॉलोनी में परिवार के साथ रहने वाली ललिता देवी कहती हैं कि देश की खातिर वे मर मिटे, इसका कोई अफसोस नहीं है।

हर किसी को अपने देश के लिए ऐसा करना चाहिए। देश होगा तो तभी हम रहेंगे। पर उन्होंने इस बात का दुख है कि जो वायदे किए गए थे वे पूरे नहीं हो पाए। उनके पास जमीन नहीं है। पांच बीघे जमीन देने की बात कही गई थी, जो नहीं मिल पाई।

 

भर आई मां की आंखें 

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शहीद के प‌र‌िवार के अन्य सदस्य - फोटो : amar ujala
शहीद के दो बेटे अतुल, रजत हैं, जबकि बेटी अनीता यादव है। इसमें अतुल मर्चेटनेवी में है, जबकि रजत बछरावां डिग्री कॉलेज में बी.काम द्वितीय वर्ष का छात्र है। वहीं बेटी अनीता यादव कालाकांकर से एमकाम कर रही है।

बच्चों को भी अपने पिता की शहादत पर गर्व है। शहीद बेटे राजेंद्र को याद करके मां सुंदरा देवी की आंखें भर आई। कहती हैं कि प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा शहीद के परिवार के भरण पोषण आदि के लिए किए गए वादे हवा हवाई साबित हुई हैं।

जहां एक और राजस्व विभाग के आला अधिकारियों को शहीद परिवार के नाम कृषि भूमि दिलाने कि कोरे वादे हैं, वही पैतृक गांव तक जाने वाली सड़क आज भी बदहाल पड़ी है। गांव में राजेंद्र यादव की तरह अन्य क्षेत्रीय नौजवानों के लिए देश की रक्षा के लिए स्वयं को तैयार करने के लिए मिनी स्टेडियम खोले जाने की घोषणा से अधिकारी बेसुध हो गए हैं।
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