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कन्नौज : वर्दी छोड़ सियासी अखाड़े में उतरे असीम अरुण, अनिल दोहरे लगा चुके हैं हैट्रिक

Mon, 14 Feb 2022 12:30 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अनुभव अवस्थी, अमर उजाला, कन्नौज
अनुभव अवस्थी, अमर उजाला, कन्नौज Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Mon, 14 Feb 2022 12:30 PM IST
सार

सपा के गढ़ पर कब्जा जमाने के लिए भाजपा ने पूर्व पुलिस कमिश्नर असीम अरुण को चुनावी मैदान में उतारा है। सपा से तीन बार विधायक रह चुके अनिल दोहरे को असीम अरुण कड़ी टक्कर दे रहे हैं।

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Kannauj: Aseem Arun left the uniform and entered the political arena, Anil doubled hat-trick
भाजपाः असीम अरुण, सपाः अनिल दोहरे, बसपाः समरजीत दोहरे, कांग्रेसः विनीता देवी। - फोटो : amar ujala

विस्तार

दुनिया भर में इत्रनगरी के नाम मशहूर कन्नौज प्रदेश की सियासत में भी अपनी खुशबू बिखेर रही है। 1997 में कन्नौज जिला बनने के बाद कन्नौज सदर सीट पर समाजवादी पार्टी का ही कब्जा रहा है। 2017 में मोदी लहर होने के बावजूद यहां भाजपा को कामयाबी नहीं मिली। इस बार सपा के गढ़ पर कब्जा जमाने के लिए भाजपा ने पूर्व पुलिस कमिश्नर असीम अरुण को चुनावी मैदान में उतारा है। सपा से तीन बार विधायक रह चुके अनिल दोहरे को असीम अरुण कड़ी टक्कर दे रहे हैं। पिछली बार भी भाजपा ने अनिल दोहरे को कड़ी टक्कर दी थी। वह महज 2454 मतों के अंतर से जीते थे। कांग्रेस ने वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राम भरोसे की पुत्रवधू विनीता देवी पर भरोसा जताया है, तो बसपा से समरजीत दोहरे ताल ठोक रहे हैं।

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कन्नौज का सियासी मिजाज राममंदिर आंदोलन के दौरान बदला। इसी मिजाज का असर था कि 1991 में भाजपा के बनवारी लाल न केवल जीते, बल्कि 1993 और 1996 में भी जीत दर्ज कर हैट्रिक लगाई। पर, 2002 में यहां एक बार फिर सियासी मिजाज बदला और सपा से कल्यान सिंह दोहरे चुने गए। उनके बाद 2007 से 2017 तक अनिल दोहरे यहां साइकिल दौड़ाने में कामयाब रहे। लगातार चार बार सपा के इस सीट पर जीत दर्ज करने से इसे सपा का गढ़ माना जाने लगा।

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यहां से पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव सांसद रह चुकी हैं। ऐसे में यह सीट सपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल भी है। देखना होगा कि वर्दी छोड़कर सियासी अखाड़े में उतरे पूर्व आईपीएस अफसर असीम अरुण क्या इस सीट को भाजपा के खाते में ला पाने में कामयाब होते हैं कि नहीं। असीम अरुण के पिता श्रीराम अरुण प्रदेश के डीजीपी रह चुके हैं। बहरहाल, उनके यहां से ताल ठोकने से यह सीट यूपी ही नहीं पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। वहीं विधायक अनिल दोहरे की बात करें तो उनके पिता बिहारी लाल दोहरे भी इस सीट से तीन बार जीत चुके हैं। पत्नी सुनीता दोहरे जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं। अनिल दोहरे 2014 से 2017 तक एससी-एसटी कमेटी के चेयरमैन भी रहे।

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मुद्दों पर मुखर हैं मतदाता
सिपाही ठाकुर इलाके के रहने वाले अधिवक्ता अनिल द्विवेदी चुनावी चर्चा छिड़ते ही कहते हैं, इस बार शिक्षा, रोजगार, सड़क और पानी बड़ा मुद्दा हैं। चुनाव के दौरान प्रत्याशी बड़े-बड़े दावे करते हैं, मगर चुनाव जीतते ही विधायक चार साल तक देखने तक नहीं आते हैं। इस बार हम अच्छे प्रत्याशी को वोट देंगे। बलायलपुर के व्यापारी निर्मल गुप्ता कहते हैं, राजनीतिक पार्टियां व्यापारियों की अनदेखी करती हैं। कोरोना के चलते व्यवसाय चौपट हो रहा है। इस पर कोई भी नेता बोलने को तैयार नहीं है।


कनपटियापुर निवासी आचार्य राकेश मिश्र का कहना है कि अब राजनीति पूरी तरह से बदल चुकी है। सभी दल सियासी नफा-नुकसान के आधार पर प्रत्याशी चुनते हैं। इस वजह से जातिवादी राजनीति को बढ़ावा मिल रहा है, जो कि समाज के लिए नुकसानदायक है। शहर के राम आसरे कुशवाहा रोजगार पर सवाल खड़ा करते हैं। वह कहते हैं, बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही है। गरीबों की हित के लिए कोई बात करने को तैयार नहीं है। इस बार जनता उसी को वोट देगी, जो गरीबों के लिए काम करेगा।


सुरक्षित सीट होने के बावजूद बसपा यहां खाता नहीं खोल सकी
अतीत में झांकें तो इस सीट पर कांग्रेस ने पांच बार अपना परचम फहराया। जनसंघ, भारतीय क्रांति दल ने भी बीच-बीच में जीत दर्ज कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। सपा ने चार बार तो भाजपा ने इस सीट पर तीन बार विजय हासिल की। भाजपा से बनवारी लाल दोहरे और सपा से अनिल दोहरे हैट्रिक लगा चुके हैं। पर, बसपा इस सीट पर जीत का स्वाद कभी नहीं चख पाई। जबकि यह सीट सुरक्षित की श्रेणी में हैं।

वोटों का गणित
एससी 1 लाख
मुस्लिम 70 हजार
ब्राह्मण 45 हजार
यादव  45 हजार
पिछड़ा वर्ग  50 हजार
लोधी  30 हजार
क्षत्रिय  15 हजार
कुशवाहा  40 हजार
अन्य  30 हजार
(आंकड़े लगभग में)
2017 का चुनाव परिणाम
अनिल कुमार दोहरे, सपा  99,635
बनवारी लाल दोहरे, भाजपा  97,181
अनुराग सिंह, बसपा  44,182 

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