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अमेरिकी शहर में मनाया जाएगा SC के इन जस्टिस के नाम से दिन, जजों की नियुक्ति पर उठाए सवाल

Sun, 10 Sep 2017 09:27 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 10 Sep 2017 09:27 AM IST
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justice chelmeshwar raises question on appointment process of judge in India.
जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर - फोटो : amar ujala

उच्च न्यायालयों में दूसरे ही प्रदेश का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की नीति पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर ने नई बहस को जन्म दे दिया है। उनका कहना है कि यदि अनुचित व्यवहार की आशंका के चलते यह नीति बनी है तो फिर मुख्यमंत्री भी दूसरे प्रदेश से ही बनाया जाना चाहिए। क्योंकि उनके यहां व्यवस्था के दुरुपयोग का चलन व आदत कहीं ज्यादा है।

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जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि हाईकोर्ट में दूसरे ही प्रदेश का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की चालीस साल पहले शुरू हुई नीति पर बहस की जरूरत है। इससे क्या लक्ष्य हासिल हुआ यह भी देखा जाना चाहिए।
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लखनऊ में शनिवार को शुरू हुए प्रदेश स्तरीय न्यायिक अधिकारी सम्मेलन में उत्तर प्रदेश की निचली अदालतों के करीब 1200 जजों के समक्ष उन्होंने यह प्रश्न उठाया। दो दिवसीय इस सम्मेलन में प्रदेश के 75 जिलों के जिला जज व अपर जिला जज भाग ले रहे हैं।
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अभिभाषण में जस्टिस चेलमेश्वर ने ‘उत्तर प्रदेश सरकार बनाम राजनारायण केस 1975’ का सीधे नाम लिए बिना कहा ‘करीब चार दशक पहले इस देश के आधुनिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया था। उसका मंच भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ही था। एक जज की निर्भीकता कैसी होती है, देश के सबसे शक्तिशाली पद पर आसीन व्यक्ति के चुनाव विवाद में देखने को मिली। उस जज के जज्बे को सलाम करने की जरूरत है। उसके बाद जो हुआ वह नया इतिहास बना।’

जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि इस मामले का उल्लेख करने का उद्देश्य यह है कि इसके बाद भारत सरकार ने सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश उस राज्य के बाहर से नियुक्त करने की नीति बना दी। ‘हर नीति की मजबूती और कमजोरियां होती हैं। इस नीति से क्या हम कुछ अच्छा उद्देश्य हासिल कर सके? क्या दोष सामने आए। इस पर बहस होनी चाहिए।

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस का औसत कार्यकाल सिर्फ एक साल

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देश में किसी चीफ जस्टिस का किसी हाईकोर्ट में औसत कार्यकाल एक साल ही होता है। किसी भी चीफ जस्टिस को क्षेत्रीय समस्याओं को जानने समझने, वहां के प्रशासन और तौर तरीकों को जानने में कुछ समय लगता है। उसे हाईकोर्ट के प्रशासनिक कार्यों में भी विशेष ध्यान देना होता है।

दूसरी ओर एक चीफ जस्टिस उसी प्रदेश का होगा तो उसके पास 25-30 वर्ष का अनुभव होगा, वह प्रदेश की समस्याओं, हालात और उनके समाधानों की समझ रखेगा।

संविधान में नहीं, लेकिन राजनीतिक दल एकमत
जस्टिस चेलमेश्वर ने किसी राजनीतिक दल का नाम लिए बिना कहा कि एक प्रमुख राजनीतिक संगठन ने यह नीति बनाई और बाकी सब इस पर सहमत हो गए। जबकि इसका प्रावधान हमारे संविधान में नहीं था। ‘मैं यह नहीं कह रहा कि इस नीति को खत्म कर दिया जाए, लेकिन इस पर बहस शुरू होनी चाहिए।’

जानिए, कौन हैं जस्टिस चेलमेश्वर

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जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर - फोटो : amar ujala

- सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जस्टिस चेलमेश्वर के सम्मान में अमेरिका के इलेनॉय राज्य का नेपरविल शहर पिछले वर्ष 14 अक्तूबर को ‘जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर दिन’ घोषित कर चुका है।

- उन्हें इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट से सेक्शन 66ए हटाने से लेकर आधार की अनिवार्यता का कानून रद्द करने, और निजता के अधिकार जैसे मामलों मील का पत्थर माने जाने वाले निर्णयों के लिए जाना जाता है।

- आंध्रप्रदेश के मछलीपट्टनम शहर से वकालत शुरू करने और इसी राज्य की हाईकोर्ट में में 1997 में अपर जज बने जस्टिस चेलमेश्वर को 2007 में गुवाहाटी हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया।

- बाद में वे केरल हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने और 2011 में सुप्रीम कोर्ट में जज के रूप में पदोन्नत हुए।

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