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जावेद अख्तर बोले, गब्बर सिंह और जंगली हिंसक जीव को देखकर आती है एक जैसी भावना

Mon, 20 Nov 2017 12:19 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 20 Nov 2017 12:19 AM IST
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javed akhtar in lucknow litrature fest.
जावेद अख्तर - फोटो : amar ujala

‘90 के दशक में फिल्म युगांधर के गीत लिखे जा रहे थे। निर्माता शकुंतला से बात हो रही थी। उन्होंने बहुत झिझकते हुए बताया कि एक कृष्ण भजन लिखना है। मेरे लिए यह मुश्किल काम नहीं था, मुझ जैसे लखनऊ के न्यू हैदराबाद में पले-बढ़े उस पीढ़ी के लेखक ने जन्माष्टमी के अवसरों पर जैसे लोकगीत सुने होंगे, शायद ही देश में किसी ने सुना होगा। कृष्णलीलाएं देखना हमारा अनूठा शौक हुआ करता था। यही अनुभव काम आया और ‘कृष्ण आएगा, आएगा युगांधर आएगा...’ गीत रचा गया।’

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मशहूर फिल्म लेखक और साहित्यकार जावेद अख्तर ने यह वाकया लखनऊ साहित्य उत्सव में रविवार को हुए विशेष सत्र ‘बुक लॉन्च : टॉकिंग फिल्म्स एंड सॉन्ग्स’ (नसरीन मुन्नी कबीर की हाल में लिखी पुस्तक) में सुनाया। जावेद ने युगांधर फिल्म के उस गीत में कृष्ण के लिए ‘कंसविनाशक’, ‘सुरदर्शनचक्रधारी’ जैसे नामों का उपयोग किया था, जिसे पढ़कर फिल्म के निर्माता और निर्देशक हैरान रह गए, वे खुद भी कृष्ण के ये नाम नहीं जानते थे।
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वे पूछ ही बैठे कि ‘जावेद अख्तर’ कृष्ण के इतने नाम कैसे जानता है। जावेद ने जवाब दिया, जो लखनऊ और अवध की भूमि पर पला-बढ़ा हो और उर्दू जानता हो, उसके लिए यह आम बात है। इस सत्र में जावेद अख्तर से कौसर मुनीन्द्र ने बातचीत की। वहीं दर्शकों ने भी सवाल-जवाब किए।
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गब्बर सिंह सभी को आकर्षित करता है
जावेद ने दावा किया कि विलेन कैरेक्टर गब्बर सिंह सभी को आकर्षित करता है। उन्हाेंने कहा कि बचपन में वे खुद भी लखनऊ जू जाते तो बाघ, तेंदुआ जैसे हिंसक जीव देखना चाहते। दरअसल वे जानवर सभी को इसलिए आकर्षित करते हैं क्योंकि वे किसी बंधन में नहीं बंधे। हम सामाजिक रूप से बंधनों में हैं और इन्हें तोड़ना चाहते हैं, लेकिन तोड़ नहीं पाते। जब फिल्म में हम गब्बर सिंह को देखते हैं तो वही भावना मन में आती है जो जंगली हिंसक जीव को देखकर आती है कि वह कितना स्वतंत्र है। इसी आकर्षण ने उसे अलग पहचान दिलाई। जावेद ने फिल्म शान, दीवार, जंजीर, त्रिशूल से जुड़ी रोचक यादें भी साझा कीं।

लखनऊ की, भारत की है उर्दू

javed akhtar in lucknow litrature fest.

दर्शकों के सवाल पर जावेद ने साफ किया कि उर्दू को किसी संप्रदाय की भाषा नहीं कहा जा सकता। वह लखनऊ की है, भले ही पाकिस्तान उसे अपनाता है, लेकिन वह भारत की है, इसे अलग-अलग रूपों में अपनाया गया है। उन्होंने उदाहरण दिया कि पंजाब में लोगों को आधा र न बोलने की आदत के लिए जाना जाता है, यह भी उर्दू से ही आई, जिसमें अक्षर के नीचे लगने वाला आधा र नहीं होता।

यहां प्रकाश परकाश हो जाता है और धर्मेंद्र धरमेन्दर। पंजाबियों की भाषा में यह विसंगति उर्दू की वजह से आई जो उनकी जनभाषा रही है। जनभाषाओं का सम्मान होना चाहिए, वैसे ही जैसे 10 करोड़ बंगालियों ने बंगाली छोड़कर उर्दू को अपनी भाषा बनाने की पाकिस्तान की कोशिशों को नकार दिया था।

राइम और रिद्म नहीं, विचार से बनती हैं कविताएं
जावेद ने कविताओं को राइम और रिद्म में सीमित रखने को गलत बताया। उन्होंने कहा कि एक अच्छा विचार कविता को सफल बनाता है वरना राइम और रिद्म तो सत्तर, इकहत्तर, बहत्तर और तिहत्तर लिखने से भी बन जाता है।

उन्होंने कहा कि जिस तेजी से कहावतें बोलचाल से खत्म हो रही हैं, इनका नुकसान आने वाले समय में देखने को मिलेगा। फिल्म निर्माता आजकल किसी गीत में चार बार ‘मौला’ शब्द डलवाकर सूफी गीत का कोटा पूरा कर रहे हैं।

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