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सवाल-जवाब: आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर बोले- दलितों का फायदा सबने उठाया, भला किसी ने नहीं किया
Tue, 07 Dec 2021 10:19 AM IST
ishwar ashish
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Tue, 07 Dec 2021 10:19 AM IST
सार
आजाद समाज पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद का कहना है कि आज की राजनीति में धनतंत्र-परिवारवाद हावी है। इसलिए इसमें सभी की हिस्सेदारी नहीं है। पेश है सुधीर सिंह की चंद्रशेखर आजाद से हुई बातचीत के प्रमुख अंश...
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आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद।
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
आजाद समाज पार्टी भी विधानसभा चुनाव में ताल ठोकने को तैयार है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद का कहना है कि आज की राजनीति में सभी की हिस्सेदारी नहीं है। वह कहते हैं कि धनतंत्र और परिवारवाद की बढ़ती राजनीति से यह हाल हुआ है। दलितों के सवाल पर वह बेबाकी से कहते हैं कि सभी दलों ने उनका इस्तेमाल किया, लेकिन उनके मुद्दे भूल गए। पेश है सुधीर सिंह की चंद्रशेखर आजाद से हुई बातचीत के प्रमुख अंश...
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सवाल - राजनीति में क्यों आना चाहते हैं?
जवाब - आजादी के 75 साल बाद भी बहुत सारे लोगों को राजनीति में अपनी हिस्सेदारी नहीं मिल पाई है। धनतंत्र और परिवारवाद की राजनीति को बढ़ावा दिए जाने की वजह से ऐसी स्थिति बनी है। मैंने बदलाव की लड़ाई लड़ने के लिए ही राजनीति में कदम रखा है। अब लोग भी समझदार हो गए हैं। दलित, पिछड़े व वंचित समाज के लोगों में भी जागरूकता आई है। जनता भी चाहती है कि धनतंत्र व परिवारवाद आधारित राजनीति बदले। ईमानदार, संघर्षशील लोग आगे आएं। इन स्थितियों को देखते हुए ही आजाद सामाज पार्टी (आसपा) का गठन किया गया है। मेरा मानना है कि व्यवस्था को बदलना जरूरी है और हमारी पार्टी उसी रास्ते पर चलकर काम करेगी।
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सवाल - ऐसे कौन से मुद्दे हैं जिनको लेकर आप चुनाव मैदान में उतरने जा रहे हैं?
जवाब - वैसे मुद्दे तो कई हैं। पर, नौजवानों के लिए रोजगार, पिछड़े इलाकों में पेयजल संकट, दलित व वंचित समाज को राजनीति में हिस्सेदारी देने, महिलाओं की सुरक्षा व सशक्तीकरण, स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों को लेकर आसपा चुनाव मैदान में उतरेगी। अब तक जितने भी दलों ने सत्ता संभाली, इन बुनियादी मुद्दों पर काम नहीं किया। अलबत्ता अपने-अपने घोषणापत्रों में इनका जिक्र जरूर ये दल करते रहे हैं। स्थिति यह है कि विधानसभा क्षेत्र बेहट के सुदूर इलाके की महिलाओं को आज भी छह किमी. दूर से पानी भरकर लाना पड़ता है। यह तो एक उदाहरण है। सहारनपुर मंडल में ऐसे तमाम इलाके हैं जहां गांवों तक सड़के नहीं पहुंची हैं। न ही बिजली पहुंची है। मंडल में लगे अधिकांश कल-कारखाने बंद हैं। अधिकांश चीनी मिलें भी बंद हैं। प्रोत्साहन नहीं मिलने से मूंगफली, बाजरा, मक्का और कपास की खेती की स्थिति बदहाल है। कुटीर उद्योग के तौर पर दस्तकारी भी दम तोड़ चुकी है। सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों व मजदूरों के हक की लड़ाई भी आसपा लड़ती रही है और आगे भी लड़ेगी।
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सवाल - आसपा चुनाव अकेले लड़ेगी या गठबंधन का इरादा है?
जवाब - वैसे तो आसपा प्रदेश के अधिकांश सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है, पर सपा, कांग्रेस समेत अन्य भाजपा विरोधी दलों के साथ गठबंधन को लेकर भी बातचीत चल रही है। गठबंधन को लेकर अगले सप्ताह तक तस्वीर साफ भी हो जाएगी। गठबंधन भी उसी दल से करेंगे, जो आसपा के मुद्दों पर राजी होगा। कई दलों से प्रारंभिक स्तर की बातचीत हो चुकी है। जल्द ही उनसे फाइनल बात होनी हैं। इसके बाद सीट आदि पर फैसला हो जाएगा। जल्द ही गठबंधन की घोषणा करेंगे।
सवाल - बसपा के मुकाबले दलितों में कैसे स्थान बनाएंगे?
जवाब - देखिए, दलित समाज हमेशा से आशावादी रहा है। इसलिए बसपा समेत सभी दलों ने समय-समय पर दलित वोट बैंक का फायदा उठाया। पर, किसी ने उनकी मूलभूत समस्याओं, मसलन-रोटी, कपड़ा और मकान जैसे मसलों को हल नहीं किया। बसपा से पहले दलित वोटबैंक कांग्रेस के साथ था और बाद में आरपीआई के साथ गया। इस समाज ने जगजीवन राम और रामविलास पासवान जैसे नेताओं को भी अपना रहनुमा माना। पर, सभी ने इस समाज को छला। बसपा के संस्थापक कांशीराम की विचारधारा के आधार पर दलित समाज ने बसपा पर अटूट विश्वास किया। पर, मायावती के बसपा की कमान संभालने के बाद वहां भी धनतंत्र हावी हो गया और दलितों का मुद्दा पीछे छूट गया। दलित समाज अब ऊब चुका है और नए विकल्प की ओर देख रहा है। आसपा के तौर पर उसके सामने एक विकल्प है। बीते पंचायत चुनाव में जिला पंचायत सदस्य के रूप में लड़ने वाले आसपा कार्यकर्ताओं को मिले करीब पौने दो लाख वोट इस बात के संकेत भी हैं कि लोग अब पार्टी को विकल्प मानने लगे हैं।