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प्राणि उद्यान : आय 60 फीसदी घटी, वन्यजीवों के खाने पर संकट गहराने की आशंका
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कोरोना संकट में नवाब वाजिद अली शाह जूलॉजिकल गार्डन (प्राणि उद्यान) की आय 60 फीसदी घट गई है। सामान्य दिनों में करीब नौ करोड़ की आय हो जाती थी। पर कोरोना में यह घटकर चार करोड़ के करीब रह गई है।
एक तरफ गिरता दर्शकों का ग्राफ तो दूसरी तरफ अंगीकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ने से वन्यजीवों के खाने पर संकट गहराने के आसार नजर आने लगे हैं। जू प्रशासन का कहना है कि फिलहाल बचत से काम चल रहा है, लेकिन गोद लेने को लोग आगे नहीं आए तो दिक्कत बढ़ सकती है।
वन्यजीवों के खानपान पर सालाना खर्च चार करोड़
प्राणि उद्यान के आंकड़े बताते हैं कि यहां 1100 वन्यजीव हैं, जिनके खानपान पर सालाना चार करोड़ रुपये खर्च होते हैं। जू का वार्षिक बजट 13-14 करोड़ का है। छह करोड़ का सरकारी अनुदान मिलता है। 2020-21 में अंगीकरण से ही 1.16 करोड़ से अधिक जू के खाते में आए थे। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, 2021-22 में अभी तक अंगीकरण से सिर्फ 6-7 लाख रुपये ही आए हैं।
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एक तिहाई रह गए दर्शक, वेतन से भी कम रह गई कमाई
कोरोना से पहले 16 लाख के करीब दर्शक सालभर में आते थे। 20-21 में यह ग्राफ घटकर 5.30 लाख रह गया। यानी संक्रमण से पहले 4-5 हजार दर्शक रोज आते थे। अब यह आंकड़ा 1500 के आसपास है। वहीं, स्टाफ के वेतन पर ही सालाना 6.50 करोड़ खर्च हो जाते हैं। बीते वर्ष में जू को टिकट बिक्री से 4.27 करोड़ की आय हुई थी।
कमाई 40 फीसदी तक रह गई, अंगीकरण के निए आगे आएं लोग
जू के डायरेक्टर आरके सिंह कहते हैं कि प्राणि उद्यान ट्रस्ट है जिसके खर्च टिकट बिक्री से चलते हैं। सरकारी अनुदान मिलता है, फिर भी वन्यजीवों को गोद ले लिए जाने से उनके खानपान का प्रबंध करना आसान होता है। पर कोरोना संकट के चलते कमाई 40 फीसदी तक ही रह गई है। फिलहाल वन्यजीवों का खर्च बचत की रकम से चलाया जा रहा है। लोगों से अपील है कि वे अंगीकरण के लिए आगे आएं तो बड़ी राहत मिलेगी।
टाइगर के खाने का बजट ही 6.75 लाख
वन्यजीवों के खाने का बजट पहले से निर्धारित होता है। टाइगर और व्हाइट टाइगर का वार्षिक खर्च 6.75 लाख रुपये है। हाइब्रिड लॉयन पर 5.50 लाख, हिप्पोपोटेमस 4.25 लाख, जिराफ मादा 3.30 लाख, चिम्पैंजी के खानपान पर 1.40 लाख रुपये का खर्च आता है। पक्षियों की अलग-अलग प्रजातियों पर आठ हजार रुपये से 1.12 लाख रुपये खर्च होते हैं। सरीसृप के खाने का खर्चा 10 से 26 हजार तक है। फिस हाउस के खाने का खर्च 25 हजार से लेकर 19.14 लाख रुपये के बीच है।
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एक तरफ गिरता दर्शकों का ग्राफ तो दूसरी तरफ अंगीकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ने से वन्यजीवों के खाने पर संकट गहराने के आसार नजर आने लगे हैं। जू प्रशासन का कहना है कि फिलहाल बचत से काम चल रहा है, लेकिन गोद लेने को लोग आगे नहीं आए तो दिक्कत बढ़ सकती है।
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वन्यजीवों के खानपान पर सालाना खर्च चार करोड़
प्राणि उद्यान के आंकड़े बताते हैं कि यहां 1100 वन्यजीव हैं, जिनके खानपान पर सालाना चार करोड़ रुपये खर्च होते हैं। जू का वार्षिक बजट 13-14 करोड़ का है। छह करोड़ का सरकारी अनुदान मिलता है। 2020-21 में अंगीकरण से ही 1.16 करोड़ से अधिक जू के खाते में आए थे। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, 2021-22 में अभी तक अंगीकरण से सिर्फ 6-7 लाख रुपये ही आए हैं।
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एक तिहाई रह गए दर्शक, वेतन से भी कम रह गई कमाई
कोरोना से पहले 16 लाख के करीब दर्शक सालभर में आते थे। 20-21 में यह ग्राफ घटकर 5.30 लाख रह गया। यानी संक्रमण से पहले 4-5 हजार दर्शक रोज आते थे। अब यह आंकड़ा 1500 के आसपास है। वहीं, स्टाफ के वेतन पर ही सालाना 6.50 करोड़ खर्च हो जाते हैं। बीते वर्ष में जू को टिकट बिक्री से 4.27 करोड़ की आय हुई थी।
कमाई 40 फीसदी तक रह गई, अंगीकरण के निए आगे आएं लोग
जू के डायरेक्टर आरके सिंह कहते हैं कि प्राणि उद्यान ट्रस्ट है जिसके खर्च टिकट बिक्री से चलते हैं। सरकारी अनुदान मिलता है, फिर भी वन्यजीवों को गोद ले लिए जाने से उनके खानपान का प्रबंध करना आसान होता है। पर कोरोना संकट के चलते कमाई 40 फीसदी तक ही रह गई है। फिलहाल वन्यजीवों का खर्च बचत की रकम से चलाया जा रहा है। लोगों से अपील है कि वे अंगीकरण के लिए आगे आएं तो बड़ी राहत मिलेगी।
टाइगर के खाने का बजट ही 6.75 लाख
वन्यजीवों के खाने का बजट पहले से निर्धारित होता है। टाइगर और व्हाइट टाइगर का वार्षिक खर्च 6.75 लाख रुपये है। हाइब्रिड लॉयन पर 5.50 लाख, हिप्पोपोटेमस 4.25 लाख, जिराफ मादा 3.30 लाख, चिम्पैंजी के खानपान पर 1.40 लाख रुपये का खर्च आता है। पक्षियों की अलग-अलग प्रजातियों पर आठ हजार रुपये से 1.12 लाख रुपये खर्च होते हैं। सरीसृप के खाने का खर्चा 10 से 26 हजार तक है। फिस हाउस के खाने का खर्च 25 हजार से लेकर 19.14 लाख रुपये के बीच है।