शिवपाल का सेकुलर मोर्चा: बनना और बिखरना ही जनता परिवार की नियति
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शिवपाल सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी से अलग होकर सेकुलर मोर्चा के गठन की बात कहकर अतीत के पन्नों को खोल दिया है। शिवपाल का यह एलान कोई नई बात नहीं है। यह एलान मूल रूप से जनता परिवार से निकलकर अस्तित्व में आए समाजवादी आंदोलन के पुराने नेताओं की राह पर ही है।
बनना और फिर बिखरना तथा उसके बाद फिर जुड़ना व जुड़कर टूटना समाजवादी आंदोलन अर्थात जनता परिवार की नियति रही है। बात दीगर है कि कभी दल टूटा तो कभी नए नाम वाले राजनीतिक गुट में फूट हो गई। मोटे तौर पर इस समय जनता परिवार से निकली लगभग नौ पार्टियां अलग-अलग नामों से राजनीति कर रही हैं।
वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय बताते हैं कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा समाजवादी आंदोलन की बड़ी समस्या रही है। इसी कारण 1952-53 से इनके टूटने व जुड़ने का सिलसिला चलता रहा है।
पहले आम चुनाव में समाजवादी विचारधारा वाले दो दलों सोशलिस्ट पार्टी और आचार्य कृपलानी के नेतृत्व वाली किसान मजदूर प्रजा पार्टी ने मिलकर प्रजा समाजवादी पार्टी (प्रसोपा) बनाई। आचार्य नरेंद्र देव, चंद्रशेखर, गौरीशंकर, नारायण दत्त तिवारी उसके नेता हुआ करते थे। 1965 में अलगाव हुआ और फिर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी बनी। इसमें भी टूट हो गई।
ये रहा है अब तक का इतिहास
शिवपाल के बयान और अतीत के घटनाक्रम को जोड़ें तो 1967 की सियासी घटनाओं को भी याद करना होगा। जब चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस से अलग होकर भारतीय लोकदल के नाम से विधायकों का समूह बनाया। फिर कम्युनिस्ट पार्टी और जनसंघ भी इसके साथ खड़े हुए।
कांग्रेस सरकार की जगह चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में संविद सरकार बनी। इसमें रुस्टम सैटिन और जनसंघ के गंगाभक्त सिंह भी मंत्री बने, पर यह मोर्चा एक साल भी टिक नहीं पाया। राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।
चरण सिंह के बाद 1970 में कांग्रेस से अलग हुए विधायकों ने त्रिभुवन नारायण सिंह (टीएन सिंह) के नेतृत्व में साझा सरकार बनाने का प्रयोग हुआ। इसमें अन्य कई दलों के साथ जनसंघ भी शामिल था। यह भी छह महीने से ज्यादा नहीं टिकी।
ये रहा है जनता परिवार का इतिहास
जनता परिवार का उदय
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आपातकाल लगाने के विरोध में जनता पार्टी नाम से जनता परिवार का उदय हुआ। जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, भारतीय लोकदल, समाजवादी आंदोलन से निकले अन्य छोटे-छोटे दलों और कांग्रेस से अलग हुए नेताओं द्वारा गठित कांग्रेस (संगठन) तक ने परस्पर विलय कर दिया।
पर, अलग-अलग विचारधारा के नेताओं की इंदिरा गांधी की नीतियों के खिलाफ बनी एकजुटता कुछ ही दिन में बिखर गई। कुछ लोगों ने जनसंघ की दोहरी सदस्यता पर सवाल खड़ा किया और कहा कि जनसंघ के नेताओं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से नाता तोड़ लेना चाहिए।
इसी बीच चौधरी चरण सिंह जो पहले से ही मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाने से असहज थे, उन्होंने मोरारजी को हटाने की मुहिम तेज कर दी। कांग्रेस ने मौके का लाभ उठाया और चरण सिंह को समर्थन देकर सरकार बनवा दी। हालांकि चौधरी साहब की सरकार भी चल नहीं पाई और 1980 में चुनाव हो गए।
कई टुकड़ों में जनता परिवार
जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद जनसंघ नेता अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, नानाजी देशमुख आदि ने 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी बना ली। चौधरी चरण सिंह ने जनता पार्टी सेकुलर बनाई। राजनारायण और जॉर्ज फर्नांडीस चौधरी चरण सिंह से अलग हो गए। राजनारायण ने सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी और जॉर्ज ने सोशलिस्ट पार्टी बनाई।
राजनारायण तो बागपत में चौधरी चरण सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ने भी उतरे। चंद्रशेखर ने समाजवादी जनता पार्टी बना ली। सुब्रह्मण्यम स्वामी जनता पार्टी की बागडोर थामे रहे। चौधरी चरण सिंह के पुराने सहयोगी व समाजवादी नेता राजपाल सिंह बताते हैं कि 1980 में चौधरी साहब की पार्टी के यूपी में 42 एमपी जीते।
देवीलाल, जॉर्ज फर्नांडीस, कर्पूरी ठाकुर, शरद यादव और बीजू पटनायक भी चौधरी साहब की ही पार्टी से जीतकर एमपी बने। यूपी में मुलायम सिंह यादव चुनाव हार गए। उधर देवीलाल, कर्पूरी ठाकुर, बीजू पटनायक और शरद यादव की गतिविधियों से नाराज चौधरी चरण सिंह ने इन सबको पार्टी से निकाल दिया। इन लोगों ने अपने-अपने राज्यों में अलग-अलग पार्टियां बना लीं। मुलायम को चरण सिंह ने विधान परिषद सदस्य बनाया।
इस तरह होते रहे घटनाक्रम
पुराने लोग बताते हैं कि साथियों के अलग-अलग पार्टी बना लेने से नाराज चौधरी चरण सिंह ने दलित मजदूर किसान पार्टी बनाई, पर यह भी ज्यादा दिन तक नहीं टिकी और 1986 में चौधरी साहब ने लोकदल को पुनर्जीवित कर लिया।
उन्हीं दिनों अजित सिंह राजनीति में आ गए और उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाया गया, पर लोकदल भी लंबे समय तक एक नहीं रह पाया। वर्ष 1987 में लोकदल के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष हेमवती नंदन बहुगुणा तथा अजित सिंह में मतभेद हो गया।
पार्टी विभाजित हो गई और लोकदल (अजित) तथा लोकदल (बहुगुणा) नाम से दो गुट बन गए। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष मुलायम सिंह थे। बंटवारे के बाद उत्तर प्रदेश में भी पार्टी विधायक दल में विभाजन की नौबत आ गई।
जानकारी के मुताबिक, अजित सिंह मुलायम सिंह यादव को नेता प्रतिपक्ष पद पर पसंद नहीं कर रहे थे। कारण यह भी था कि विभाजन के बाद मुलायम लोकदल (ब) के प्रदेश अध्यक्ष थे। अजित ने विधायकों में विभाजन कराकर शाहजहांपुर के सतपाल यादव को विधायक दल का नेता बनवा दिया। नतीजतन मुलायम नेता प्रतिपक्ष के पद से हट गए।
मुलायम सिंह ने किया क्रांति मोर्चा का गठन
अजित से लगातार खींचतान के चलते मुलायम सिंह ने क्रांति मोर्चा का गठन किया, जिसमें लोकदल (ब) सहित कुछ अन्य पार्टियां भी शामिल हुईं। चंद्रशेखर की पार्टी भी मोर्चा का हिस्सा थी।
इसी बीच, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में खरीदी गई बोफोर्स तोपों में घोटाले का आरोप लगाकर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बगावत कर दी। उनकी अगुवाई में कांग्रेस से निकले नेताओं आरिफ मोहम्मद खान, अरुण नेहरू, विद्याचरण शुक्ल ने जनमोर्चा बनाया। बाद में इसके साथ क्रांति मोर्चा भी आया।
फिर 11 अक्तूबर 1988 को बंगलूरू में जनता दल का गठन हुआ, जिसमें लोकदल (ब), जनमोर्चा और अन्य कुछ पार्टियां विलय कर दी गईं। लोकदल (अ) भी इसमें शामिल हो गया। भाजपा ने भी इन्हें बाहर से समर्थन देने की घोषणा की। सीटों का तालमेल भी हुआ। पर, नेता पद को लेकर मुलायम सिंह यादव और अजित सिंह में फिर ठन गई।
हालांकि नेता मुलायम ही चुने गए लेकिन अजित इससे नाराज हो गए। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अजित को केंद्र में मंत्री बनाकर मामला संभालने की कोशिश की। राम मंदिर आंदोलन के चलते टकराव के कारण भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया। कांग्रेस, मुलायम के साथ आई, पर यह दोस्ती भी ज्यादा नहीं टिक सकी।
जनता दल कई हिस्सों में बंटा
जनता दल कई हिस्सों में बंट गया। लालू के नेतृत्व में अलग, देवेगौड़ा के नेतृत्व में अलग, बीजू पटनायक की अगुवाई में अलग और जॉर्ज फर्नांडीस, शरद यादव व नीतीश कुमार अलग। बाद में एक और विभाजन हुआ। नीतीश कुमार व जॉर्ज ने समता पार्टी बना ली।
हालांकि बाद में फिर समझौता हो गया और जनता दल (यू) बना। यूपी में रालोद व लोकदल नाम से भी अलग-अलग दल बन गए। चंद्रशेखर के नेतृत्व में समाजवादी जनता पार्टी फिर जिंदा हो गई। समाजवादी जनता पार्टी से ही कुछ लोगों को तोड़कर मुलायम ने 1992 में समाजवादी पार्टी का गठन किया।
उत्तर प्रदेश की बात करें तो इस समय जनता दल (यू), लालू का राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (सेकुलर), समाजवादी जनता पार्टी, लोकदल (सुनील सिंह) और राष्ट्रीय लोकदल जैसे राजनीतिक दल जनता परिवार का ही हिस्सा रहे हैं। हरियाणा का इंडियन लोकदल भी इसी जनता परिवार से टूटकर बना है।
...पर टिकाऊ नहीं रहे मोर्चा या गठबंधन
वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि मोर्चा बना लेना तो आसान है। उस पर जनादेश भी मिल सकता है, पर समस्या नेतृत्व को लेकर आती है। प्रदेश में राजनीतिक मोर्चों की सफलता का इतिहास बहुत अच्छा नहीं रहा है। ये उत्साह से बने तो लेकिन कुछ ही दिनों बाद उनके भीतर इतने अंतर्विरोध पैदा हो गए कि ये टिकाऊ नहीं रहे। कभी नेतृत्व के मुद्दे पर झगड़ा हुआ तो कभी महत्वाकांक्षाओं की टकराहट इसकी वजह बनी। कभी मुस्लिम वोट बैंक साधने के गणित व समीकरण ने कुछ लोगों को मोर्चों व गठबंधनों को तोड़ने के लिए उकसाया।