लखनऊ की वो इमारतें, जो कहती हैं जंग-ए-आजादी की दास्तां
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लखनऊ ने आजादी के संग्राम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और पूरे देश को प्रेरित करने की भूमिका निभाई। स्वतंत्रता दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर लखनऊ में स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी प्रमुख घटनाओं के पृष्ठों को पलट रहे हैं आलोक पराड़कर...।
लखनऊ में तैयार होने लगी थी 1857 के गदर की पृष्ठभूमि
यूं तो देश में अंग्रेज शासन के खिलाफ बगावत की चिंगारी 10 मई 1857 को मेरठ के विद्रोह में भड़की थी, लेकिन उसके काफी पहले ही लखनऊ में इसकी पृष्ठभूमि तैयार होने लगी थी।
11 फरवरी 1856 को अवध राज्य को अधिग्रहीत करने और वाजिद अली शाह को गद्दी छोड़ने के लिए विवश करने के बाद से ही लोगों में अंग्रेज शासकों के प्रति नाराजगी बढ़ने लगी थी। लोगों को यह बात पसंद नहीं आई कि उनके धार्मिक स्थलों, नवाबों के महलों पर अंग्रेज फौजें तैनात करते जा रहे हैं।
जमींदार और तालुकेदार इस बात से भयभीत थे कि उनकी जमीन भी छिनी जा सकती है। व्यापारियों पर नए-नए करों का भार बढ़ता जा रहा था। अंग्रेज शासक भी इस असंतोष को महसूस करने लगे थे।
मेरठ में बगावत की चिंगारी भड़कने और दिल्ली में क्रांतिकारियों का कब्जा होने की खबरें ने लखनऊ में इस असंतोष को हवा दी और यहां भी विद्रोह भड़क उठा। रेजीडेंसी, चिनहट, आलमबाग, ला-मार्टीनियर, सिकंदराबाद जैसी जगहों पर घमासान युद्ध हुए।
30 जून 1857 में विद्रोही सैनिकों ने हेनरी लॅारेन्स की फौज को धूल चटा दी और उन्हें वापस जाना पड़ा। सैयद खालिस्तान हैदर ने अपनी पुस्तक ‘सवानहात-ए-शालीन-ए-अवध’ में माना है कि लखनऊ में 30 जून से सैनिक विद्रोह का आरंभ हो गया और लखनऊ के साथ ही अवध के दूसरे इलाकों में भी इसकी शुरुआत होने लगी।
रेजीडेंसी की घेराबंदी
चिनहट में विद्रोही सैनिकों से मिली शिकस्त के बाद अंग्रेज सैनिकों और उनके परिवार के लोगों ने रेजीडेंसी में शरण ली थी। कई दूसरे क्षेत्रों के अंग्रेज भी यहां आकर छिप गए थे, लेकिन विद्रोही सैनिकों ने वहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा और बड़ी संख्या में वहां पहुंचकर उसे रेजीडेंसी को घेर लिया और जमकर गोलीबारी की।
एक और दो जुलाई को जमकर हमले हुए। रेजिडेंसी करीब 86 तक क्रांतिकारियों के कब्जे में रही। विद्रोही सैनिकों के हमलों में अवध के चीफ कमिश्नर हेनरी लॉरेन्स की मौत हो गई।
राजकीय अभिलेखागार के अभिलेखों के अनुसार, ‘30 जून 1857 को चिनहट की हार के एक दिन बाद अंग्रेजों ने प्राणरक्षा हेतु रेजीडेंसी में शरण ली। इनमें 130 अफसर, 700 देशी सिपाही, 150 गैर सैनिक, 237 महिलाएं, 260 बच्चे, 50 स्कूली छात्र, 727 यूरोपियन एवं देशी असैनिक, इस प्रकार कुल मिलाकर 2994 लोग थे।
क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी को घेर लिया। क्रांतिकारियों द्वारा की गई गोलीबारी में हेनरी लॉरेन्स मारा गया। 30 जून से 25 सितंबर तक 86 दिन का घेरा चलता रहा। 25 सितंबर को हैवलॉक और आउटरम रेजीडेंसी तक पहुंचे परंतु अन्तत: सर कॉलिन कैम्पबेल ने 25 नवंबर 1857 को रेजीडेंसी में घिरे अंग्रेजों को मुक्त कराया।’
बेगम हजरत महल का नेतृत्व
हजरत महल, जो वाजिद अली शाह की बेगम थीं, ने वीरता के साथ स्वतंत्रता के आंदोलन में संघर्ष किया और अंग्रेजों का मुकाबला किया।
क्रांतिकारियों को जब शाही खानदान का कोई वारिस न मिला तो उन्होंने पांच जुलाई 1857 को वाजिद अली शाह के बेटे मिर्जा बिरजिस कद्र को गद्दी पर बैठा दिया और मां हजरत महल सल्तनत की मुख्तार बन गई।
उन्होंने करीब आठ महीने शासन किया और फिर अंग्रेज सेना से जंग भी लड़ी। इस दौरान क्रांतिकारियों से जगह जगह हुए संघर्ष में जनरल जेम्स नील, मेजर हडसन जैसे अंग्रेज अधिकारियों की मौत हुई।
रौलेट बिल का व्यापक विरोध
रौलेट बिल के विरोध में लखनऊ में 1919 में हुई सभा भी ऐतिहासिक थी। यह एक ऐसा काला कानून था, जिसमें बिना किसी सुनवाई के ही सरकार को किसी को भी मुजरिम ठहराने तथा सजा देने का अधिकार दिया गया था।
राजकीय अभिलेखागार के अभिलेखों के अनुसार, ‘एक काला कानून रौलेट बिल के नाम से आया था। इसके विरुद्ध लखनऊ में सभा का आयोजन नवाब जुलकदर जंग की अध्यक्षता में किया गया था, जिसमें जफर उल मुल्क, गोकरण नाथ मिश्र, हरकरण नाथ मिश्र, फिरंगी महल के मौलवी अयूब, एपी सेन सहित 15 हजार लोगों ने भाग लिया।’
काकोरी ट्रेन एक्शन ने अग्रेजों को बुरी तरह डरा दिया था
स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण घटना रहा काकोरी ट्रेन एक्शन लखनऊ के निकट काकोरी में हुआ। इस घटना ने अंग्रेजों की बुरी तरह डरा दिया। इस योजना के लिए शाहजहांपुर में सात अगस्त 1925 को हुई बैठक में चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, शचीद्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त सहित कई क्रांतिकारियों ने शामिल होकर व्यापक योजना बनाई थी और तय किया गया कि सहारनपुर से लखनऊ आने वाली 8 डाउन पैसेंजर से ले जाए जाने वाले अंग्रेज सरकार के खजाने को लूट लिया जाय।
आठ अगस्त को असफल होने के बाद क्रांतिकारियों ने इसे नौ अगस्त को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। इस घटना में जर्मनी में बने माउजर पिस्तौल का प्रयोग किया गया था। क्रांतिकारियों को लूट में साढ़े चार हजार रुपये से अधिक की राशि मिली थी।
बौखलाए अंग्रेजों ने व्यापक अभियान चलाकर 40 क्रांतिकारी पकड़े। आजाद फरार रहे और इलाहाबाद में शहीद हुए। बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान, रोशन सिंह और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को फांसी शचीद्र नाथ सान्याल, मुकुंदी लाल, गोविद चरण, योगेशचंद्र चटर्जी और शचीद्र नाथ बख्शी को आजीवन कारावास की सजा हुई। मन्मथनाथ गुप्त को 14 वर्ष तथा कई अन्य क्रांतिकारियों को तीन से 10 वर्ष तक की सजा हुई।
साइमन का विरोध
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी लखनऊ में कई बार आए और स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरित किया। 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता हुआ।
28 दिसंबर 1916 को हुए कांग्रेस के अधिवेशन में वे पहली बार आए और चारबाग पर उनसे जवाहर लाल नेहरू से मुलाकात हुई। उन्होंने 1920 और 1921 में भी यहां सभाएं कीं। लखनऊ में साइमन कमीशन का व्यापक विरोध भी हुआ। 1928 में साइमन गो बैक के नारे चारो ओर लगने लगे।
जवाहर लाल नेहरू ने इस दौरान लखनऊ विश्वविद्यालय में पर्चा भी वितरित किया था। विरोध करने वालों की संख्या इतनी अधिक थी कि कैम्प जेल बनाकर उनमें लोगों को भरा जाने लगा।
25 जून 1934 को गांधी जी के आगमन पर अमीनाबाद में झंडे वाले पार्क में तिरंगा फहरा दिया गया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भी लखनऊ के लोगों की भागीदारी रही।