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कुलियों की समस्या पर कोर्ट की अफसरों को खरी-खोटी

Sat, 26 Oct 2013 09:58 AM IST
दिलीप द्विवेदी/लखनऊ
दिलीप द्विवेदी/लखनऊ Updated Sat, 26 Oct 2013 09:58 AM IST
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high court statement of officers working

समाज के निचले तबके की रोजी-रोटी संबंधी निर्णय जल्द लिए जाने चाहिए।

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ऐसे हालात नहीं पैदा किए जाने चाहिए जो लोगों को मानसिक पीड़ा, कुंठा व खर्चे के नुकसान की कीमत पर हाईकोर्ट की शरण लेने पर मजबूर करते हों।

हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने यह अहम टिप्पणी कुली के रूप में पंजीकरण करवाने के लिए पांच साल से भटक रहे फरियादी की याचिका पर सुनाए गए फैसले में की है।

कोर्ट ने कुलियों की पीड़ा का शिद्दत से संज्ञान लेते हुए उस सिस्टम के प्रति गहरा सरोकार दिखाया, जिसमें एक कुली को अदने से काम के लिए आखिरकार हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।

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न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह व न्यायमूर्ति अशोकपाल सिंह की खंडपीठ ने कुली रशीद अहमद की याचिका पर यह फैसला सुनाया।

याची को पंजीकरण केलिए पांच साल से दौड़ाया जा रहा था। कोर्ट ने याची को दो हफ्ते में 7 अक्तूबर के नोटिस के तहत पूरे दस्तावेज पेश करने की छूट दी है।

वहीं, उत्तर रेलवे मुरादाबाद के मंडल रेल प्रबंधक को याची के कुली केरूप में पंजीकरण के लिए एक माह में निर्णय लेने को कहा है।

कोर्ट ने पुलिस व अन्य संबंधित अफसरों को भी निर्देश दिया कि डीआरएम का इस मामले से संबंधित पत्र मिलने के बाद वे तत्काल अपनी राय बताएंगे। कोर्ट ने इन निर्देशों व टिप्पणियों के साथ रिट का निपटारा कर दिया।
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हाकिमों का लचर रवैया कतई तर्कसंगत नहीं
अदालत ने कहा, याची ने कुली के रूप में पंजीकरण के लिए वर्ष 2008 में रेलवे अफसरों के समक्ष आवेदन किया था। उसकी अर्जी लंबित रखी गई।

अफसरों के इस लचर रवैए को कतई तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता जबकि मामला समाज के सबसे निचले तबके से जुड़ा हुआ हो।

कोर्ट ने इस मामले में डीआरएम सुधीर अग्रवाल को तलब किया। उन्होंने अदालत को बताया कि गत 7 अक्तूबर को याची को कुछ दस्तावेज पेश करने केलिए नोटिस जारी किया गया था।

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