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पीलीभीत में सिखों के एनकाउंटर का मामला : हाईकोर्ट ने सुनाई सजा, 43 पुलिसकर्मी गैर इरादतन हत्या में दोषसिद्ध

Thu, 15 Dec 2022 08:53 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Thu, 15 Dec 2022 08:53 PM IST
सार

अपीलार्थियों की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि कथित एनकाउंटर में मारे गए मृतकों में से कई का लंबा आपराधिक इतिहास था। न्यायालय को यह भी बताया गया कि वे खालिस्तान लिब्रेशन फ्रंट नामक आतंकी संगठन के सदस्य भी थे।

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High Court sentenced, 43 policemen convicted of culpable homicide not amounting to murder
लखनऊ हाईकोर्ट

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने पीलीभीत में वर्ष 1991 के दस सिखों को खालिस्तान लिब्रेशन फ्रंट का आतंकी बता कर कथित एनकाउंटर में मार दिए जाने के मामले में 43 पुलिसकर्मियों को गैर इरादतन हत्या का दोषी करार दिया है। ट्रायल कोर्ट ने इन पुलिसकर्मियों को हत्या का दोषी पाते हुए 4 अप्रैल 2016 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। न्यायालय ने निचली अदालत के उक्त फैसले को निरस्त करते हुए दोषी पुलिसकर्मियों को सात-सात साल कारावास की सजा सुनाई है। यह आदेश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति सरोज यादव की खंडपीठ ने अभियुक्त पुलिसकर्मियों देवेंद्र पांडेय व अन्य की ओर से दाखिल अपीलों पर सुनवाई के बाद पारित किया।

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अपीलार्थियों की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि कथित एनकाउंटर में मारे गए मृतकों में से कई का लंबा आपराधिक इतिहास था। न्यायालय को यह भी बताया गया कि वे खालिस्तान लिब्रेशन फ्रंट नामक आतंकी संगठन के सदस्य भी थे। कहा गया कि मृतकों में बलजीत सिंह उर्फ  पप्पू, जसवंत सिंह, हरमिंदर सिंह उर्फ  मिंटा, सुरजन सिंह उर्फ  बिट्टू व लखविंदर सिंह के खिलाफ  हत्या, लूट व टाडा आदि मामले दर्ज थे।
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हालांकि इस बिंदु पर न्यायालय ने अपने 179 पृष्ठों के निर्णय में कहा है कि मृतकों में से कुछ का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था, ऐसे में निर्दोषों को आतंकियों के साथ मार देना स्वीकार्य नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने आगे कहा कि इस मामले में अपीलार्थियों और मृतकों के बीच कोई दुश्मनी नहीं थी। अपीलार्थी सरकारी सेवक थे और उनका उद्देश्य कानून व्यवस्था बनाए रखने का था। न्यायालय ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि अपीलार्थियों ने इस मामले में अपनी शक्तियों का आवश्यकता से अधिक इस्तेमाल किया लेकिन उन्होंने यह इस विश्वास के साथ किया कि वे अपने विधिपूर्ण और आवश्यक दायित्व का निर्वहन कर रहे थे। न्यायालय ने कहा कि इन परिस्थितियों में अपीलार्थियों को आईपीसी की धारा 302 में नहीं बल्कि सिर्फ ,धारा 304 पार्ट 1 में दोषी करार दिया जा सकता है।
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यह मामला पीलीभीत का है जहां कुछ सिख तीर्थयात्री 12 जुलाई 1991 को पीलीभीत से एक बस से तीर्थयात्रा के लिए जा रहे थे। इस बस में बच्चे और महिलाएं भी थीं। इस बस को रोक कर 11 लोगों को उतार लिया गया। इनमें से 10 की पीलीभीत के न्योरिया, बिलसांदा और पूरनपुर थाना क्षेत्रों के क्रमश: धमेला कुंआ, फगुनिया घाट व पट्टाभोजी इलाके में एनकाउंटर दिखाकर हत्या कर दी गई। आरोप है कि 11वां शख्स एक बच्चा था जिसका अब तक कोई पता नहीं चला। अपीलार्थियों की ओर से दलील दी गई कि मारे गए दस में से बलजीत सिंह उर्फ  पप्पू, जसवंत सिंह, हरमिंदर सिंह उर्फ  मिंटा तथा सुरजन सिंह उर्फ  बिट्टू खालिस्तान लिब्रेशन फ्रंट के आतंकी थे। इसके साथ ही उन पर हत्या, डकैती, अपहरण व पुलिस पर हमले जैसे जघन्य अपराध के मामले दर्ज थे।


दोषी पुलिसकर्मी
दोषी करार दिए गए पुलिसकर्मियों में रमेश चंद्र भारती, वीरपाल सिंह, नत्थू सिंह, सुगम चंद, कलेक्टर सिंह, कुंवर पाल सिंह, श्याम बाबू, बनवारी लाल, दिनेश सिंह, सुनील कुमार दीक्षित, अरविंद सिंह, राम नगीना, विजय कुमार सिंह, उदय पाल सिंह, मुन्ना खान, दुर्विजय सिंह पुत्र टोडी लाल, गयाराम, रजिस्टर सिंह, दुर्विजय सिंह पुत्र दिलाराम, हरपाल सिंह, राम चंद्र सिंह, राजेंद्र सिंह, ज्ञान गिरी, लखन सिंह, नाजिम खान, नारायन दास, कृष्णवीर, करन सिंह, राकेश सिंह, नेमचंद्र, शमशेर अहमद व शैलेंद्र सिंह फिलहाल जेल में हैं। जबकि देवेंद्र पांडेय, मोहम्मद अनीस, वीरेंद्र सिंह, एमपी विमल, आरके राघव, सुरजीत सिंह, राशिद हुसैन, सैयद आले रजा रिजवी, सत्यपाल सिंह, हरपाल सिंह व सुभाष चंद्र जमानत पर हैं। न्यायालय ने इन्हें हिरासत में लेने का आदेश दिया है। अपील के विचाराधीन रहते तीन अपीलार्थियों दुर्गापाल, महावीर सिंह व बदन सिंह की मृत्यु हो चुकी थी।

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