{"_id":"58e74ce74f1c1bdc315b7971","slug":"high-court-objects-in-closing-down-meat-shops-in-up","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"गोश्त की दुकाने बंद होने को हाईकोर्ट ने ठहराया गलत, कहा- खान-पान निजी मामला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गोश्त की दुकाने बंद होने को हाईकोर्ट ने ठहराया गलत, कहा- खान-पान निजी मामला
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
Updated Fri, 07 Apr 2017 04:31 PM IST
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डेमो पिक
अवैध बूचड़खानों और बिना लाइसेंस चल रहीं गोश्त की दुकानों को बंद कराने के प्रदेश सरकार के निर्णय को लेकर दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कहा है कि सरकार को स्वास्थ्य, संस्कृति, खान-पीने की व्यक्तिगत आदतों, लोगों के सामाजिक-आर्थिक स्तर, खाद्य पदार्थों की उपलब्धता, उनके दाम, क्वालिटी पर विचार करते हुए किसी तरह का प्रकट या परोक्ष एक्शन लेना चाहिए।
जो लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं, उन्हें ऐसा नहीं लगना चाहिए कि यह सब अचानक कर दिया और गैरकानूनी है। ऐसे एक्शन में संविधान में दी गई धर्मनिरपेक्षता का ध्यान रखा जाना चाहिए। गैरकानूनी गतिविधियों को रोकने के साथ-साथ सरकार को खान-पान की उन आदतों का निर्वाह करने देना होगा जो कानून के खिलाफ नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने यह नसीहत लखीमपुर खीरी में गोश्त की दुकान चलाने वाले सईद अहमद की याचिका पर दी है। जस्टिस अमरेश्वर प्रताप साही और जस्टिस संजय हरकौली ने अपने निर्णय में प्रदेश सरकार को 10 दिन में हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखने के लिए कहा है। मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल को होगी।
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याची ने बताया था कि उसकी दुकान का लाइसेंस 31 मार्च 2017 को खत्म हो गया। वह बकरी का गोश्त बेचता था और यही उसकी जीविका का साधन था। अब नगर पालिका वित्त वर्ष 2017-18 के लिए उनका लाइसेंस रिन्यू नहीं कर रही है। सरकार के आदेशों के बाद अवैध बूचड़खानों और गोश्त की दुकानों को बंद कराया जा रहा है, जिससे वह अपनी दुकान नहीं चला पा रहा है।
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जो लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं, उन्हें ऐसा नहीं लगना चाहिए कि यह सब अचानक कर दिया और गैरकानूनी है। ऐसे एक्शन में संविधान में दी गई धर्मनिरपेक्षता का ध्यान रखा जाना चाहिए। गैरकानूनी गतिविधियों को रोकने के साथ-साथ सरकार को खान-पान की उन आदतों का निर्वाह करने देना होगा जो कानून के खिलाफ नहीं हैं।
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हाईकोर्ट ने यह नसीहत लखीमपुर खीरी में गोश्त की दुकान चलाने वाले सईद अहमद की याचिका पर दी है। जस्टिस अमरेश्वर प्रताप साही और जस्टिस संजय हरकौली ने अपने निर्णय में प्रदेश सरकार को 10 दिन में हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखने के लिए कहा है। मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल को होगी।
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याची ने बताया था कि उसकी दुकान का लाइसेंस 31 मार्च 2017 को खत्म हो गया। वह बकरी का गोश्त बेचता था और यही उसकी जीविका का साधन था। अब नगर पालिका वित्त वर्ष 2017-18 के लिए उनका लाइसेंस रिन्यू नहीं कर रही है। सरकार के आदेशों के बाद अवैध बूचड़खानों और गोश्त की दुकानों को बंद कराया जा रहा है, जिससे वह अपनी दुकान नहीं चला पा रहा है।
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पशुवध का इंतजाम नहीं किया, प्रतिबंध लगा दिया
डेमो पिक
हाईकोर्ट ने निर्णय में कहा कि प्रदेश में खाने की जो आदतें विकसित हुई हैं, वह यहां की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति का हिस्सा है। कानून के पालन की वजह से इसमें कोई कमी नहीं आनी चाहिए। प्रतिबंध की वजह से मांसाहार करने वाले नागरिकों और आम जनजीवन पर भी असर पड़ा है। उन्हें मांस नहीं मिल रहा है, जो उनकी व्यक्तिगत पसंद है। सरकार ने पशुवध की व्यवस्था किए बिना ही इस कारोबार पर प्रतिबंध लगा दिया।
गांवों में तो सुविधाएं भी नहीं
अदालत ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत जरूरतें आज भी पूरी नहीं हो पातीं। गांवों में लोग बकरी पालन, मछली पालन, मुर्गीपालन करते हैं, वे खुद अपने उत्पाद बेचते हैं। इन्हें यूपी सरकार के बनाए कानून प्रमोट भी करते हैं। सरकार ने जिस तरह से इस पूरी प्रक्रिया को चलाना अनिवार्य किया है, वे ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं हैं। ऐसे में सरकार को छोटे विक्रेताओं को उनका काम जारी रखने देने पर विचार करना होगा, ताकि स्थानीय आबादी की जरूरतें पूरी की जा सकें।
पहले छोटे दुकानदारों के मामले देखें
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सरकार को निर्देश दिया कि वह पहले छोटे गोश्त विक्रेताओं के लाइसेंस के मामले को देखे। पशुवध के विभिन्न तरीकों पर उसे विचार करना होगा और व्यवस्था करनी होगी। जब पशुवध की व्यवस्था ही नहीं होगी तो समस्याएं बढ़ेंगी। अगर नगर निगम, जिला पंचायत इसकी व्यवस्था नहीं करते हैं तो याची जैसे नागरिकों की जीविका का साधन खत्म हो जाएगा।
गांवों में तो सुविधाएं भी नहीं
अदालत ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत जरूरतें आज भी पूरी नहीं हो पातीं। गांवों में लोग बकरी पालन, मछली पालन, मुर्गीपालन करते हैं, वे खुद अपने उत्पाद बेचते हैं। इन्हें यूपी सरकार के बनाए कानून प्रमोट भी करते हैं। सरकार ने जिस तरह से इस पूरी प्रक्रिया को चलाना अनिवार्य किया है, वे ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं हैं। ऐसे में सरकार को छोटे विक्रेताओं को उनका काम जारी रखने देने पर विचार करना होगा, ताकि स्थानीय आबादी की जरूरतें पूरी की जा सकें।
पहले छोटे दुकानदारों के मामले देखें
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सरकार को निर्देश दिया कि वह पहले छोटे गोश्त विक्रेताओं के लाइसेंस के मामले को देखे। पशुवध के विभिन्न तरीकों पर उसे विचार करना होगा और व्यवस्था करनी होगी। जब पशुवध की व्यवस्था ही नहीं होगी तो समस्याएं बढ़ेंगी। अगर नगर निगम, जिला पंचायत इसकी व्यवस्था नहीं करते हैं तो याची जैसे नागरिकों की जीविका का साधन खत्म हो जाएगा।