क्या सपा से डर गई कांग्रेस या फिर..
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
छिबरामऊ में सड़क किनारे अपने ट्यूबवेल के पास खड़ा किसान सोबरन कहता है ‘अखिलेश भइया के मुख्यमंत्री बनै के बाद बिजुली का सबसे ज्यादा फायदा किसानन का भा है।
इक तौ खेतन से रात मा किसानन के अपहरण नाय सुनाय पड़त, काहे कि चौबीसो घंटे लइनिया (बिजली) आवै से सिंचाई-थ्रेशिंगिया दिनै मा होई जात है, अउर रात मा खेतन में जायै के जरूरते नाय पड़त।’
बिजली के कारण किसान ही नहीं अन्य लोगों की जीवनशैली भी थोड़ी बदली है। बिजली के उपकरण बेचने वाले स्थानीय दुकानदार नारायनदास कंजानी कहते हैं- अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद इंडक्शन चूल्हे की बिक्री में जोरदार उछाल आया।
विकास के किये काम पर चुनौती कठिन
यूं तो अखिलेश के मुख्यमंत्री व डिम्पल के सांसद बनने के बाद कन्नौज में इंजीनियरिंग कॉलेज, कैंसर हॉस्पिटल, पैरामेडिकल इंस्टीट्यूट जैसी विकास की अनेक परियोजनाएं आईं।
अखिलेश के करीबी नवाब सिंह यादव कहते हैं कि डेढ़ साल में विकास का जितना काम कन्नौज में हुआ, उतना शायद ही किसी लोकसभा क्षेत्र में हुआ हो।
पर पिछला चुनाव निर्विरोध जीतने वाली डिम्पल के चुनाव में विकास मुद्दा नहीं बन पा रहा है। दरअसल उपचुनाव के समय घुटने टेकने वाला विपक्ष अब चुनौती देता नजर आ रहा है।
इस दौरान घटनाएं भी कुछ ऐसी हुईं। मसलन पिछले एक साल के दौरान क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम टकराव की करीब एक दर्जन घटनाएं हुईं, जिसमें भाजपा के लोगों ने ठीक से दिलचस्पी ली।
बिरादरी के कारण मोदी का है
लेकिन मोदी हमारी बिरादरी के हैं, सो इस बार बिरादरी का झुकाव उनकी तरफ होना सहज और स्वाभाविक है।
वहीं बसपा प्रत्याशी पिछले छह महीने से दलितों, मुसलमानों व ब्राह्मणों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए सक्रिय है।
एक स्थानीय पत्रकार कहते हैं कि दोनों दलों के प्रत्याशियों के नामांकन में उनकी बढ़ती हुई ताकत नजर भी आई।
आप के उम्मीदवार की दिलचस्पी नहीं
अभी उन्होंने सक्रियता नहीं बढ़ाई है। लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे के दूसरे प्रस्तावित रूट को लेकर आंदोलित किसान भी प्रदेश सरकार से नाराजगी जताने में हिचक नहीं रहे हैं।
किसान संघर्ष समिति के संयोजक, मतौली गांव के निवासी प्रबल प्रताप सिंह बघेल कहते हैं कि नए रूट में करीब 50 गांव के किसानों की तीन व चार फसल देने वाली जमीन जा रही है।
कन्नौज से ज्यादा अखिलेश के समर्थकों का विकास
जमीन जाने पर प्रभावित किसानों ने सवा महीने से ज्यादा धरना-अनशन किया पर सत्ता प्रतिष्ठान ने हमारी सुध नहीं ली।
पिछले कई चुनावों से सपा को ही वोट देने वाले हाजी शरीफ जिन्दनी रहमतुल्लाह अलह दरगाह कमेटी के अध्यक्ष हाजी शम्सुल खान कहते हैं कि कन्नौज का विकास हुआ पर उससे ज्यादा रफ्तार से उनके समर्थकों का हुआ है।
सबसे ज्यादा आलू यहीं, लेकिन आलू पर एक भी उद्योग नहीं किसान विद्यालय के पूर्व प्रिंसिपल व बडे़ आलू किसान योगेंद्र सिंह कहते हैं कि आलू किसानों की अनदेखी कर कन्नौज के विकास का दावा करना बेमानी है।
यह विडंबना ही तो है कि प्रदेश में सर्वाधिक आलू पैदा करने वाले जिले में आलू मंडी नहीं है।
खत्म हो रहा है इत्र उद्योग
बडे़ इत्र व्यवसायी व जगत एरोमा के मालिक जे.एन. कपूर कहते हैं कन्नौज की पहचान रहा खुशबुओं का कारोबार इस शहर से विदा हो रहा है।
बमुश्किल 20 फीसदी बचा रह गया है। ज्यादातर इत्र कारोबारी अब कोल्ड स्टोरेज व वाहनों की डीलरशिप के धंधे में चले गए हैं।
पहला कारण चंदन की लकड़ी की कमी है। गुलाब, बेला, जैस्मिन, लेमनग्रास और खस इत्यादि की खेती को बढ़ावा देकर इस इंडस्ट्री को बचाया जा सकता है।
हालांकि अखिलेश सरकार ने इत्र पर से वाणिज्यकर 12 से घटाकर 4 फीसदी करके इंडस्ट्री को थोड़ी राहत अवश्य दी है।
ये देंगे डिम्पल को टक्कर
मुख्यमंत्री की पत्नी, अखिलेश के इस्तीफे के कारण हुए उपचुनाव में निर्विरोध जीतने के कारण सुर्खियों में आईं।
तरकश के तीर-विकास योजनाओं को भुनाने की कोशिश। यादव, मुस्लिम सहित हर जाति में पार्टी का कुछ न कुछ दखल।
सुब्रत पाठक (भाजपा)
तेज तर्रार हिंदूवादी नेता की छवि। मां कन्नौज नगरपालिका अध्यक्ष। अखिलेश के खिलाफ पिछला लोकसभा चुनाव लड़े थे।
तरकश के तीर-मोदी फैक्टर पर बहुत भरोसा, सवर्ण के लोध जाति का भाजपा की तरफ बढ़ता झुकाव।
कांग्रेस ने नहीं उतारा प्रत्याशी
तरकश के तीर- दलित वोटों के अलावा मुस्लिम व ब्राह्मण वोटों पर भरोसा। करीब 7 महीने से क्षेत्र में सक्रिय।
इमरान जफर (आप) कानपुर के रहने वाले, आप के वॉलंटियर, नामांकन तो कर दिया पर अभी क्षेत्र में सक्रिय नहीं। तरकश के तीर-केजरीवाल की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से प्रभावित लोगों के सहयोग व समर्थन की आस।
कांग्रेस का कोई उम्मीदवार नहीं-राजनीतिक शिष्टाचार का हवाला देकर सपा ने जिस तरह रायबरेली व अमेठी में सोनिया गांधी और राहुल के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं खड़ा किया वैसे ही कांग्रेस ने डिम्पल के खिलाफ किसी को मुकाबले में नहीं उतारा है।