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ग्राउंड रिपोर्टः मां दुर्गा से बंधी भारत-नेपाल के रिश्तों की डोर, माओवादी भी नहीं रोक पाए परंपरा

Fri, 03 Jul 2020 01:02 PM IST
ishwar ashish विभाकर शुक्ला, अमर उजाला, श्रावस्ती
विभाकर शुक्ला, अमर उजाला, श्रावस्ती Published by: ishwar ashish Updated Fri, 03 Jul 2020 01:02 PM IST
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India Nepal Border News: ground report from india-nepal border
देवीपाटन मंदिर - फोटो : amar ujala

भारत-नेपाल के रिश्तों के बीच मां दुर्गा के रिश्तों की डोर है। तुलसीपुर स्थित देवीपाटन शक्तिपीठ में पंचमी की पूजा तब होती है जब नेपाल से भक्त सिद्ध रतननाथ की डोली वहां पहुंचती है। ऐसे ही जब श्रावस्ती सहित कई जिलों के नवदंपतियों का जीवन तब तक प्रारंभ नहीं होता जब तक वह नेपालगंज में मां बागेश्वरी के दर्शन न कर लें।

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दोनों देशों के बीच कई ऐसे धार्मिक सूत्र हैं जो उन्हें एक-दूसरे से बांधे रखने का काम कर रहे हैं। चीन का जब-जब नेपाल पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा है। नेपाल के साथ भारत के संबंधों में खटास आई है। इस समय भी चीन का प्रभाव नेपाली राजनीति पर है नतीजा भारत व नेपाल के बीच कुछ खाई सी दिखने लगी है।
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लेकिन यह खाई ज्यादा दिनों तक नहीं बनी रह सकती है। इसे दोनों देशों के लोग ही पाट कर खत्म कर देंगे। इसका कारण है कि भारत-नेपाल के बीच मां दुर्गा के रिश्तों से बंधी एक डोर भी है, जो सीमा की रेखाओं व नक्शों में हो रहे परिवर्तन के बाद भी लोगों को अलग नहीं होने देती।
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यही कारण है कि श्रावस्ती सहित आसपास जिलों में रहने वाले लोगों की कुल 51 शक्तिपीठों में से एक देवीपाटन की मां पाटेश्वरी देवी के चौखट पर जब तक नवरात्र की पंचमी में नेपाल के डांग जिले के भक्त सिद्ध रतननाथ की डोली नहीं पहुंचती तब तक पूजा प्रारंभ नहीं होती। 

नवदंपती का मंदिर पर माथा टेके बिना वैवाहिक जीवन प्रारंभ नहीं होता

India Nepal Border News: ground report from india-nepal border
इसी प्रकार जब तक नेपालगंज स्थित मां बागेश्वरी देवी के मंदिर की चौखट पर श्रावस्ती बहराइच, लखीमपुर के साथ नेपाली क्षेत्र के कई जिलों के नवदंपती आकर माथा न टेकें उनका वैवाहिक जीवन प्रारंभ ही नहीं होता। इसी प्रकार मुंडन, जन्मदिन सहित कई संस्कार हैं जो दोनों देश के लोग या तो यहां से नेपाल और नेपाल से यहां मां पाटेश्वरी में ही आकर करते हैं। 

नेपाल में माओवाद के नाम पर हुए सशस्त्र आंदोलन में भी चीन की ही सहमति मानी जाती थी। उस समय भी माओवादियों ने भारत का कई मुद्दों पर विरोध किया था। उस दौर में भी मां पाटेश्वरी से बंधी डोर कमजोर नहीं हुई। कहा जाता है कि नेपाल के डांग निवासी बाबा रतननाथ कई सिद्धियों के स्वामी थे। उन्होंने मक्का-मदीना में जाकर मोहम्मद साहब को भी ज्ञान दिया था।

मोहम्मद साहब ने ही बाबा रतननाथ से प्रभावित होकर उन्हें पीर की उपाधि दी थी। बाबा रतननाथ मां पाटेश्वरी के अनन्य भक्त होने के साथ ही गुरू गोरक्षनाथ के शिष्य भी थे। मां पाटेश्वरी की पूजा के लिए बाबा अक्सर देवीपाटन आया करते थे। इसी दौरान गुरु गोरक्षनाथ ने बाबा रतननाथ को एक अमृतपात्र दिया था। लगभग 700 वर्ष से यह अमृत कलश को चैत्र नवरात्र के पंचमी की तिथि को बाबा रतननाथ के प्रतिनिधि के रूप में डांग से देवीपाटन लाया जाता है। उसके बाद ही पंचमी को मां पाटेश्वरी की पूजा शुरू होती है।  

मां बागेश्वरी कई जिलों की कुल देवी

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नेपालगंज स्थित मां बागेश्वरी के दर्शन करने गए श्रद्धालु (फाइल फोटो) - फोटो : amar ujala
नेपालगंज स्थित मां बागेश्वरी बहराइच, श्रावस्ती, नेपाल के जिला बांके व लखीमपुर सहित अन्य जिलों की कुल देवी के रूप में मान्य हैं। यहां नवरात्र ही नहीं बल्कि हर शुभ दिनों पर भारतीय क्षेत्र से जाने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। अधिसंख्य परिवारों में चाहे मुंडन संस्कार हो या फिर कोई अन्य संस्कार। सभी मां बागेश्वरी के चौखट पर होते हैं। यही नहीं मां बागेश्वरी मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं व उनके वाहनों से कस्टम व पुलिस ने कभी टैक्स नहीं लिया। माओवादी भी कभी श्रद्धालुओं के बाधक नहीं बने। 

नेपाल में चल रहे माओवादी आंदोलन के समय नेपाल का डांग जिला आंदोलन का केंद्र बिंदु था। अधिकांश माओवादियों का कैंप इसी जिले की पहाड़ियों पर था। यात्रा के समय जब सिद्ध रतननाथ बाबा की सवारी निकलती थी। तो यही आंदोलनकारी मां पाटेश्वरी व बाबा रतननाथ का जयकारा लगाते हुए सीमा क्षेत्र तक आते थे। 

घर-घर में पूजे जाते हैं नेपाल के सालिग्राम
भारत नेपाल के बीच धार्मिक संबंध प्राचीन काल से रहा है। नेपाल के बागेश्वरी मंदिर, काठमांडू के पशुपतिनाथ, मस्तांग स्थित मुक्तिनाथ दोनों देशों को आपस में जोड़े हुए हैं। जब नेपाल के मुक्तिनाथ से सालिग्राम पत्थर आता है तो वह संपूर्ण भारत में विष्णु स्वरूप भगवान सालिग्राम के रूप में पूजा जाता है। इससे घनिष्ठ संबंध और क्या हो सकता है कि एक देश का पत्थर दूसरे देश का भगवान हो। ऐसे में भारत नेपाल के बीच खटास की बात कैसे की जा सकती है। - कुमार कोइराला चेयरमैन भारत नेपाल कल्चरल सोसाइटी पालपा नेपाल
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