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डकैती पड़ने के बाद खुश क्यों था सेठ

Sun, 11 Aug 2019 01:57 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sun, 11 Aug 2019 01:57 AM IST
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freedom fight in lucknow
आजादी की लड़ाई में लखनऊ के आम लोगों का काफी योगदान रहा। हालांकि पता नहीं किन कारणों से इसकी बहुत चर्चा नहीं हुई। टुकड़ों-टुकड़ों में मौजूद संस्मरणों को अगर एक साथ मिलाएं तो पता चलता है कि लखनऊ की धरती ने हर महत्वपूर्ण विभूति को न सिर्फ अपनी खुशी के साथ गले लगाया बल्कि उनको आगे बढ़ाने में पूरी ताकत से साथ दिया। अंग्रेजों से आजादी दिलाने के लिए अहिंसक आंदोलन करने वाले हों या क्रांति के रास्ते से आजादी हासिल करने का संकल्प लेकर काम करने वाले, यह धरती साहित्य और संस्कृति के माध्यम से अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले दिग्गजों का भी केंद्र रही। ऐसे भी लोगों को इस जमीन ने जन्म दिया जिन्होंने नाम और यश की कीर्ति से दूर रहते हुए आजादी की लड़ाई में योगदान दिया। मध्य प्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन ने एक ऐसा ही संस्मरण लिखा है, ‘चौक के पुरानी सब्जीमंडी मोहल्ले में बड़े-बड़े रईस रहते थे। इन रईसों में ज्यादातर सोने-चांदी और महाजनी का कारोबार करते थे। एक दिन एक रईस के यहां कुछ नकाबपोशों ने धावा बोल दिया और पिस्तौल की नोक पर तिजोरी खुलवा ली। तिजोरी ऊपर तक सोने-चांदी और रुपये-पैसों से भरी हुई थी। नकाबपोशों ने तिजोरी से कुछ सामान निकाला और फिर तिजोरी की चाबी सेठ को वापस करते हुए कहा, ‘देखिए, हम लोग डकैत नहीं हैं। क्रांतिकारी हैं और देश की आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस लड़ाई के लिए कुछ धन की जरूरत थी इसलिए उतना धन लेकर जा रहे हैं। बाकी धन या जेवर से हमारा कोई लेना-देना नहीं। आपको नुकसान पहुंचाना हमारा मकसद नहीं है।’ नकाबपोश चले गए तो सेठ उठे और काम करने वालों को मिठाई खिलाई। किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था। सेठ इस बात से खुश थे कि पहली बार उनका धन देश के काम तो आया।
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