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लखनऊ पहुंचे फिल्म अभिनेता रजा मुराद, बोले- फिल्मों को बुलंदियों तक पहुंचाने में...

Sat, 28 Nov 2020 10:28 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Sat, 28 Nov 2020 10:28 AM IST
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film actors raza murad and shahbaz khan reached in lucknow for Jashn-e-urdu program
शाहबाज खान व रजा मुराद - फोटो : अमर उजाला
फिल्मों को बुलंदियों तक पहुंचाने में उर्दू का अहम योगदान है। उर्दू ने इस समाज को बहुत कुछ दिया है। बॉलीवुड हिंदी फिल्मों के रूप में प्रचलित है। अधिकांश फिल्मों की भाषा हिंदुस्तानी या बोलचाल की हिंदी है। मुगल-ए-आजम, पाकीजा, निकाह, रजिया सुल्तान जैसी अनेक फिल्मों में उर्दू का बेहतरीन इस्तेमाल हुआ है।
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यह कहना है फिल्म अभिनेता रजा मुराज का, जो शुक्रवार को उर्दू अकादमी में आयोजित जश्न-ए-उर्दू के पहले दिन ‘फिल्मी दुनिया और पत्रकारिता में उर्दू का योगदान’ विषयक सेमिनार में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। इस मौके पर वक्ताओं ने उर्दू को रोजगार से जोड़ने की जरूरत पर भी जोर दिया। 
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उत्तर प्रदेश आर्टिस्ट एकेडमी की ओर से आयोजित सेमिनार में अभिनेता रजा मुराद ने कहा कि उर्दू को रोजगार से जोड़ने की जरूरत है। अभिनेता शाहबाज खान ने कहा कि बॉलीवुड फिल्मों को कैफी, शकील बदायुंनी, साहिर, मजरूह जैसे शायरों ने लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाया है। बावजूद, उर्दू बोलने वाले उर्दू से दूर होते जा रहे है। लेखक एसके प्रसाद ने उर्दू से जुड़ने की अपील की। कार्यक्रम की अध्यक्षता अब्दुल नसीर नासिर ने की
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मोहम्मद रफी के गीतों से सजी महफिल 

उर्दू राजनीति पर हुए तीसरे सत्र में मुर्तुज अली, मोहम्मद अली, दीपक रंजन ने विचार रखते हुए उर्दू की प्रासंगिकता बताई। इसी क्रम में नवाब जाफर मीर अब्दुल्लाह, अतहर नबी और मोहसिन खान ने उर्दू के गद्य-पद्य रचनाकारों व उनकी रचनाओं के हवाले से उर्दू को एक समृद्ध भाषा बताया।

कार्यक्रम के दौरान कर्नल जाहिद की पुस्तक का विमोचन भी किया गया। इस अवसर पर अर्जुन और जमाल ने संगीत महफिल सजाई। महाभारत में अर्जुन बने फिरोज खान ने मो. रफी के ‘मैं कहीं कवि न बन जाऊ...’, ‘आजा-आजा मै हूं प्यार तेरा...’, ‘जमाल ने पग घुंघरू बांध मीरा नाची थी...’, ‘मेरे महबूब कयामत होगी...’ जबकि ईशा खान ने ‘सौ साल पहले...’, ‘रात के हमसफर... सहित कई गीत सुनाए। समारोह में आए मेहमानों को संस्था के सचिव वामिक खान व अध्यक्ष संजय सिंह ने स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।

डिजिटल से प्रिंट तक उर्दू पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल 

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में उर्दू पत्रकारिता पर चर्चा हुई, जिसमें हिसाम सिद्दीकी ने कहा कि उर्दू के भविष्य को लेकर जहां लोग फिक्रमंद हैं, वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो उर्दू का भविष्य रौशन मानते हैं। फिल्में हों या टीवी धारावाहिक सब जगह उर्दू की जरूरत है।

उर्दू मीडिया के उजले पक्ष को देखा जाए, तो यह पीत पत्रकारिता से काफी हद तक दूर है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार और कुछ अन्य मीडिया समूह उर्दू चैनल्स लाए हैं। उर्दू अखबारों की वेबसाइटें और ई-संस्करण इत्यादि भी खासे हैं।

फैजान मुसन्ना ने कहा कि अनेक अखबारों ने उर्दू के लिए हिंदी की देवनागरी लिपि भी अपनाई है। इन सबसे तो यही संकेत मिलता है कि उर्दू पत्रकारिता के लिए माहौल पहले से सुधरा है। उर्दू सहाफत के ऐतिहासिक सामाजिक पक्ष को समेटे इस सत्र में एवी सिंह, अफीफ सिराज इत्यादि शामिल हुए। कार्यक्रम का संयोजन एसएन लाल ने किया। 

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